सनातन धर्म के षोडश संस्कार
गर्भ से जीवन के अंतिम संस्कार तक वैदिक जीवन-पद्धति
सनातन धर्म में मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा नहीं माना गया, बल्कि उसे विभिन्न संस्कारों के माध्यम से क्रमशः संस्कारित और धर्ममय बनाने की एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। इसी दृष्टि से गर्भाधान से लेकर जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण पड़ावों तक संस्कारों की परंपरा विकसित हुई।
संस्कार शब्द का सामान्य अर्थ है—किसी व्यक्ति या वस्तु को परिष्कृत करना, उसमें श्रेष्ठ गुणों का आधान करना और जीवन के किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन को धार्मिक एवं सामाजिक रूप से स्वीकार करना।
वैदिक परंपरा में संस्कारों का विस्तृत विधान मुख्यतः गृह्यसूत्रों में मिलता है। भारत सरकार के Vedic Heritage Portal के अनुसार विभिन्न गृह्यसूत्र परंपराओं में संस्कारों की संख्या सोलह मानी गई है और उनके समय, विधि तथा नियमों का वर्णन गृह्यसूत्रों में मिलता है। वहाँ दी गई एक प्रमुख सूची में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, विद्यारम्भ, कर्णभेद, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, केशान्त और अन्त्येष्टि शामिल हैं।