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महर्षि पतञ्जलि प्रणीतं योगदर्शनम्

महर्षि पतञ्जलि प्रणीतं योगदर्शनम् ॥

॥ प्रथमोऽध्यायः ॥  ॥ समा॑धि-पा॒दः ॥

अ॒थ योगानु॑शास॒नम् ॥ १.१॥

योगश्चित्तवृत्ति॑निरो॒धः ॥ १.२॥

त॒दा द्र॒ष्टुः स्व॒रू॒पेऽ॑वस्था॒नम् ॥ १.३॥

वृत्तिसारूप्यमि॑तर॒त्र ॥ १.४॥

वृ॒त्त॒यः पञ्चतय्यः क्लि॑ष्टाऽक्लि॒ष्टाः ॥ १.५॥

प्र॒मा॒णवि॒प॒र्ययवि॒क॒ल्पनि॒द्रास्मृ॒तयः॑ ॥ १.६॥

प्र॒त्यक्षा॒नु॒माना॒ग॒माः प्र॑माणा॒नि ॥ १.७॥

वि॒प॒र्य॒यो मि॑थ्याज्ञा॒नमतद्रूप॑प्रति॒ष्ठम् ॥ १.८॥

श॒ब्दज्ञा॒ना॒नुपा॒ती वस्तुशून्यो॑ विक॒ल्पः ॥ १.९॥

अ॒भा॒वप्रत्ययालम्बना वृ॑त्तिर्नि॒द्रा ॥ १.१०॥

अ॒नु॒भूतविषया॒सम्प्रमोषः॑ स्मृ॒तिः ॥ १.११॥

अ॒भ्या॒सवै॒रा॒ग्या॒भ्यां त॑न्निरो॒धः ॥ १.१२॥

त॒त्र स्थि॒तौ य॑त्नोऽभ्या॒सः ॥ १.१३॥

स॒ तु दी॒र्घकालनै॒रन्तर्यस॒त्कारा॒सेवि॒तो दृ॑ढभू॒मिः ॥ १.१४॥

दृ॒ष्टानुश्रविकवि॒ष॒यवि॒तृष्णस्य व॒शीकारसंज्ञा॑ वैरा॒ग्यम् ॥ १.१५॥

दुर्गा सप्तशती अध्याय 13: राजा सुरथ और समाधि वैश्य को देवी का वरदान

 

1. राजा सुरथ और समाधि वैश्य की साधना

दुर्गा सप्तशती के अंतिम अध्याय में राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की कथा आगे बढ़ती है। दोनों अपने-अपने जीवन में गहरे दुःख और मोह का अनुभव कर चुके थे। महर्षि मेधा के उपदेश से उन्हें महामाया की महिमा का ज्ञान मिला था और वे देवी की शरण में जाने के लिए प्रेरित हुए थे।

राजा सुरथ अपना राज्य खो चुके थे। उनके अपने ही लोगों ने उनसे सत्ता छीन ली थी। समाधि वैश्य को उसके परिवार और संबंधियों ने संपत्ति से अलग कर दिया था। फिर भी दोनों के मन में अपने पुराने संबंधों के प्रति मोह बना हुआ था।

महर्षि मेधा से देवी-माहात्म्य सुनने के बाद दोनों ने देवी की उपासना करने का निश्चय किया। वे नदी के तट पर गए और वहाँ संयम तथा श्रद्धा के साथ तपस्या करने लगे।

2. मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी की आराधना

दुर्गा सप्तशती अध्याय 12: देवी-माहात्म्य का फल और देवी की महिमा

 

1. देवताओं का प्रश्न

नारायणी स्तुति और देवी के आश्वासन के बाद देवताओं के मन में यह प्रश्न उठा कि देवी की महिमा का श्रवण, उनका स्मरण और उनकी उपासना करने से मनुष्यों को क्या फल प्राप्त होता है।

देवताओं ने देवी से पूछा कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक उनके माहात्म्य को सुनता है, उसका पाठ करता है अथवा उनकी कथाओं का स्मरण करता है, उसे किस प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं? संकट के समय देवी का स्मरण करने से क्या परिणाम होता है? और नियमित उपासना किस प्रकार मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती है?

देवी ने इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए अपनी महिमा के श्रवण, पाठ और स्मरण के विभिन्न फल बताए।

अध्याय 11 दुर्गा सप्तशती: नारायणी स्तुति और देवी की महिमा

 

1. शुम्भ-वध के बाद देवताओं की स्तुति

शुम्भ के वध के साथ देवी और असुरों के बीच चल रहा भीषण युद्ध समाप्त हो गया। देवताओं के सामने से संकट दूर हो चुका था। तीनों लोकों में शांति और संतुलन लौटने लगा।

देवताओं ने देवी के इस महान पराक्रम को देखकर उनकी स्तुति की। इंद्र सहित सभी देवताओं ने देवी को प्रणाम किया और उनकी उस शक्ति का स्मरण किया, जिसके कारण संसार की रक्षा होती है।

देवताओं ने अनुभव किया कि देवी केवल युद्ध में असुरों का विनाश करने वाली शक्ति नहीं हैं। वे समस्त जगत का आधार, प्राणियों की चेतना और संसार में विद्यमान विभिन्न शक्तियों की मूल सत्ता भी हैं।

इसी भाव से देवताओं की स्तुति को नारायणी स्तुति कहा जाता है।

अध्याय 10 दुर्गा सप्तशती: शुम्भ-वध की कथा और देवी की अंतिम विजय

 

1. निशुम्भ की मृत्यु और शुम्भ का क्रोध

निशुम्भ के मारे जाने के बाद असुरराज शुम्भ क्रोध से भर उठा। उसके अनेक योद्धा और सेनापति पहले ही देवी के हाथों मारे जा चुके थे। अब उसका भाई भी युद्धभूमि में गिर चुका था।

शुम्भ ने देवी को चुनौती देते हुए कहा कि वे दूसरों की सहायता लेकर युद्ध कर रही हैं और इसी कारण स्वयं को शक्तिशाली समझती हैं।

देवी ने उसके आरोप का उत्तर देते हुए अपनी वास्तविक शक्ति का परिचय दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में जो अनेक शक्तियाँ दिखाई दे रही हैं, वे उन्हीं की अभिव्यक्तियाँ हैं। वे किसी दूसरी शक्ति के सहारे युद्ध नहीं कर रहीं।

अध्यात्म 9 — दुर्गा सप्तशती: निशुम्भ-वध — जब देवी ने असुर की शक्ति को परास्त किया

 

1. रक्तबीज के वध के बाद असुरों का आक्रमण

रक्तबीज का वध हो चुका था। उसकी विशेष शक्ति समाप्त होने के बाद असुरों की सेना कमजोर पड़ गई। देवी चण्डिका और उनके साथ उपस्थित मातृकाओं ने युद्ध में असुरों को भारी क्षति पहुँचाई थी।

अपने सैनिकों और सेनापतियों का विनाश देखकर शुम्भ और निशुम्भ क्रोधित हो उठे। उन्हें विश्वास था कि वे अपनी शक्ति से देवी को पराजित कर सकते हैं, लेकिन लगातार मिल रही पराजय ने उनके सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी।

निशुम्भ ने स्वयं युद्धभूमि में उतरने का निर्णय किया। वह अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी की ओर बढ़ा। उसके साथ असुरों की सेना भी थी।

देवी चण्डिका ने निशुम्भ का सामना किया। दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो गया।

अध्याय 8 दुर्गा सप्तशती: रक्तबीज-वध और माँ काली की अद्भुत शक्ति

 

1. चण्ड-मुण्ड के वध का समाचार

चण्ड और मुण्ड का वध हो चुका था। जब शुम्भ को अपने दोनों सेनापतियों के मारे जाने का समाचार मिला, तो वह क्रोध से भर उठा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि देवी ने उसके इतने शक्तिशाली सेनापतियों और उनकी सेना को पराजित कर दिया है।

शुम्भ ने अब देवी के विरुद्ध अधिक बड़ी शक्ति लगाने का निर्णय किया। उसने अपने असुर सेनापतियों को आदेश दिया कि वे विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में जाएँ और देवी को पराजित करें।

असुरों की ओर से अनेक दल युद्ध के लिए तैयार हुए। चण्ड-मुण्ड के वध के बाद भी शुम्भ का अहंकार कम नहीं हुआ था। वह अब भी देवी को अपनी इच्छा के अधीन करना चाहता था।

अध्याय 7 : चण्ड-मुण्ड वध — माँ चामुण्डा का प्राकट्य

 

1. चण्ड-मुण्ड ने देवी को देखा

धूम्रलोचन का वध हो चुका था। उसकी सेना भी देवी और उनके सिंह के सामने टिक नहीं सकी। जब यह समाचार शुम्भ तक पहुँचा, तो वह क्रोधित हो उठा। उसे विश्वास था कि उसकी विशाल सेना और शक्तिशाली सेनापति देवी को अवश्य पराजित कर देंगे, लेकिन एक के बाद एक उसके प्रयास विफल हो रहे थे।

इसी समय शुम्भ के दो प्रमुख सेनापति, चण्ड और मुण्ड, देवी के पास पहुँचे। उन्होंने देवी को हिमालय के एक भाग में विराजमान देखा। देवी का स्वरूप तेजस्वी था और उनका दिव्य सौंदर्य असाधारण दिखाई देता था।

चण्ड और मुण्ड ने देवी को देखकर अपने स्वामी शुम्भ के सामने उनका वर्णन किया था। अब वे देवी को अपने अधिकार में लेने के उद्देश्य से आगे बढ़े। शुम्भ की इच्छा थी कि देवी को किसी भी तरह उसके सामने लाया जाए।

अध्याय 6 दुर्गा सप्तशती: धूम्रलोचन-वध की कथा और देवी की शक्ति

 

1. शुम्भ का आदेश और धूम्रलोचन का प्रस्थान

दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में शुम्भ ने देवी को अपने अधीन करने का प्रयास किया था। उसने अपना दूत सुग्रीव भेजकर देवी को संदेश दिया कि वे उसके पास आ जाएँ। लेकिन देवी ने स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटेंगी और जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा, वही उन्हें प्राप्त करने का अधिकारी होगा।

देवी का उत्तर सुनकर शुम्भ क्रोधित हो गया। उसे विश्वास था कि उसकी शक्ति और ऐश्वर्य के सामने कोई टिक नहीं सकता। उसने अपने शक्तिशाली सेनापति धूम्रलोचन को बुलाया और आदेश दिया कि वह अपनी विशाल सेना के साथ जाए तथा देवी को पकड़कर उसके सामने उपस्थित करे।

शुम्भ ने कहा कि देवी यदि शांतिपूर्वक उसके पास आने के लिए तैयार न हों, तो उन्हें बलपूर्वक लाया जाए। यदि कोई उनका साथ देकर विरोध करे, तो उसे भी समाप्त कर दिया जाए।

आदेश पाकर धूम्रलोचन अपनी सेना के साथ देवी की ओर चल पड़ा।

अध्याय 5 दुर्गा सप्तशती: देवी-दूत-संवाद और शुम्भ-निशुम्भ का अहंकार

 

1. शुम्भ और निशुम्भ का उदय

महिषासुर के वध के बाद देवताओं को कुछ समय के लिए राहत मिली थी। लेकिन आगे चलकर शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो शक्तिशाली असुरों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली। उन्होंने अनेक देवताओं को पराजित कर दिया और उनके अधिकार अपने अधीन कर लिए।

शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं के पद, संपत्ति और ऐश्वर्य पर अधिकार कर लिया। इन्द्र का अधिकार छिन गया, सूर्य और चन्द्रमा से संबंधित अधिकारों पर भी असुरों का नियंत्रण हो गया। यज्ञों में देवताओं को मिलने वाले भागों पर भी उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया।

देवता स्वर्ग से वंचित हो गए और उन्हें फिर से संकट का सामना करना पड़ा। वे समझ गए कि शुम्भ और निशुम्भ की शक्ति का प्रतिरोध करना आवश्यक है।

अध्याय 4 दुर्गा सप्तशती: शक्रादि स्तुति और देवी की महिमा

 

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4: शक्रादि स्तुति और देवी की महिमा

1. महिषासुर के वध के बाद देवताओं की प्रसन्नता

महिषासुर का वध हो चुका था। उसके अत्याचारों से पीड़ित देवताओं को अब राहत मिली। स्वर्ग पर महिषासुर ने जो अधिकार कर लिया था, वह समाप्त हो गया और देवताओं के सामने अपनी व्यवस्था पुनः स्थापित करने का अवसर आया।

देवताओं के मन में देवी के प्रति कृतज्ञता का भाव उमड़ पड़ा। इन्द्र सहित सभी देवता देवी के सामने उपस्थित हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर देवी को प्रणाम किया और उनकी महिमा का गान आरंभ किया।

देवताओं ने अनुभव किया कि जिस शक्ति के सामने महिषासुर की विशाल सेना और उसका पराक्रम टिक नहीं सके, वह शक्ति संसार की रक्षा और कल्याण के लिए प्रकट हुई थी।

इसलिए उन्होंने देवी को केवल युद्ध में विजय दिलाने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत की आधारशक्ति के रूप में नमन किया।

अध्याय 3 दुर्गा सप्तशती: महिषासुर वध की कथा और उसका आध्यात्मिक रहस्य

 


1. महिषासुर का युद्धभूमि में उतरना

दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में देवी ने महिषासुर की विशाल सेना का संहार किया था। उसके अनेक सेनापति और सैनिक मारे जा चुके थे, लेकिन महिषासुर स्वयं अभी युद्धभूमि में उपस्थित था।

अपनी सेना का विनाश देखकर महिषासुर क्रोधित हो उठा। उसने देवी को पराजित करने के लिए स्वयं युद्ध आरंभ किया। उसके साथ बचे हुए असुर भी देवी और उनके सिंह पर आक्रमण करने लगे।

महिषासुर साधारण असुर नहीं था। वह अपनी शक्ति और रूप बदलने की क्षमता के कारण युद्ध में अत्यंत कठिन प्रतिद्वंद्वी सिद्ध हो रहा था। वह कभी भैंसे का रूप धारण करता, कभी सिंह बन जाता, कभी मनुष्य के समान दिखाई देता और कभी हाथी का रूप लेकर आक्रमण करता।

देवी ने उसके प्रत्येक रूप का सामना किया। युद्ध लगातार भीषण होता गया।

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