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यह अध्याय “कर्म दर्शन - बंधन से चेतना तक” पुस्तक पर आधारित है।
एक सुबह, एक युवक अपने किचन की खिड़की से बाहर झांक रहा था। उसने देखा कि पड़ोस के बच्चे खेलते हुए चिल्ला रहे हैं, और एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बगीचे में पौधों को पानी दे रहा है। युवक के मन में अचानक सवाल उठा—“वे इतने प्रसन्न कैसे हैं? मेरे पास भी सब कुछ है—काम, पैसा, सोशल लाइफ—फिर भी मैं क्यों बेचैन हूँ?”
मनुष्य का जीवन हमेशा इस प्रश्न के बीच झूलता रहता है—“मैं खुश क्यों नहीं हूँ?” और “सच्चा आनंद कहाँ है?” हम यह सोचते हैं कि जब हमारे पास यह या वह उपलब्धि होगी, तो खुशी अपने आप मिल जाएगी। लेकिन जब वह हासिल होती है, तो वह खुशी क्षणिक होती है, और मन फिर अगली खोज में निकल पड़ता है। यही वह चक्र है जिसमें अधिकांश लोग जीवन के अंत तक उलझे रहते हैं।







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