Religious Woarld Smart Search


Sort :
Loading...
Go to Page :

ऐसी मूढ़ता क्यों, हे मन? | संतसेवी परमहंस महाराज का अनमोल प्रवचन

 ऐसी मूढ़ता क्यों, हे मन?

पूज्य महर्षि मेही परमहंस महाराज के शिष्य, पूज्य महर्षि संतसेवी परमहंस महाराज अपने प्रवचन में मनुष्य के मन की एक बड़ी विचित्र स्थिति को समझाते हैं।

मनुष्य जानता है कि संसार की वस्तुओं से मिलने वाला सुख स्थायी नहीं है। यह भी जानता है कि इच्छा पूरी होने के बाद कुछ समय तो अच्छा लगता है, लेकिन फिर मन किसी दूसरी चीज के पीछे दौड़ने लगता है। फिर भी मन रुकता नहीं।

वह बार-बार उसी रास्ते पर जाता है।

संतसेवीजी कहते हैं कि यही मन की सबसे बड़ी उलझन है।

हम जानते कुछ हैं और करते कुछ हैं।

हम जानते हैं कि क्रोध अच्छा नहीं है, फिर भी क्रोध आ जाता है। जानते हैं कि लोभ मन को अशांत करता है, फिर भी लोभ छोड़ना कठिन लगता है। जानते हैं कि विषयों के पीछे भागने से मन को स्थायी शांति नहीं मिलेगी, फिर भी मन बार-बार उन्हीं विषयों की ओर आकर्षित होता है।

आखिर ऐसा क्यों?

मन पुरानी आदतों का गुलाम है

संतसेवीजी इस बात को समझाने के लिए बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं।

मान लीजिए किसी गरीब किसान के पास एक गाय है। किसान स्वयं गरीब है, इसलिए गाय को भी पर्याप्त अच्छा भोजन नहीं मिल पाता। उसे रूखी-सूखी घास से ही गुजारा करना पड़ता है।

अब किसी संपन्न व्यक्ति की नजर उस गाय पर पड़ती है। वह सोचता है—गाय अच्छी है, लेकिन इसे ठीक से भोजन नहीं मिल रहा। वह गाय को खरीदकर अपने घर ले आता है।

अब गाय को हरी-हरी घास मिलने लगती है। दाना मिलता है। रहने की अच्छी जगह मिलती है। शरीर भी स्वस्थ होने लगता है।

लेकिन एक दिन उसकी रस्सी खुल जाती है।

गाय क्या करेगी?

वह फिर उसी पुराने घर की ओर चल पड़ती है, जहाँ उसे पहले रूखा-सूखा भोजन ही मिलता था।

क्यों?

क्योंकि उसे उस जगह की आदत थी।

उसे यह समझने में समय लगेगा कि अब उसे इससे कहीं अच्छा स्थान मिल चुका है।

संतसेवीजी कहते हैं कि हमारे मन की दशा भी कुछ ऐसी ही है।

हमारा मन भी वर्षों से संसार के विषयों में लगा हुआ है। उसे वही अपना परिचित संसार लगता है। इसलिए जब हम उसे भजन, ध्यान और परमात्मा की ओर लगाना चाहते हैं, तो वह तुरंत वहाँ टिक नहीं जाता।

वह भागता है।

कभी किसी पुराने विचार की ओर, कभी किसी इच्छा की ओर, कभी किसी व्यक्ति की ओर, कभी किसी घटना की ओर।

हम बैठते हैं ध्यान करने और मन न जाने कहाँ-कहाँ घूम आता है!

मन को दोष देने से काम नहीं चलेगा

यहाँ एक बहुत गहरी बात समझने की है।

यदि ध्यान करते समय मन इधर-उधर भागता है, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए।

संतसेवीजी का संकेत है कि मन की पुरानी आदत एक दिन में नहीं बदलेगी।

जिस मन ने संसार में वर्षों तक दौड़ना सीखा है, उसे भीतर की ओर मोड़ने में अभ्यास लगेगा।

जैसे गाय को अच्छे भोजन की आदत लगने में समय लगता है, वैसे ही मन को भजन के आनंद की आदत डालनी पड़ेगी।

इसलिए साधना में सबसे जरूरी चीज है—

बार-बार मन को वापस लाना।

मन भाग गया?

वापस लाओ।

फिर भाग गया?

फिर वापस लाओ।

आज दस बार भागा तो दस बार वापस लाओ। कल सौ बार भागे तो सौ बार वापस लाओ।

यही अभ्यास धीरे-धीरे मन की दिशा बदलता है।

विषयों से मन कभी सचमुच तृप्त क्यों नहीं होता?

संतसेवीजी अपने प्रवचन में एक और बहुत महत्वपूर्ण बात समझाते हैं।

हम सोचते हैं—

“बस यह चीज मुझे मिल जाए, फिर मैं सुखी हो जाऊँगा।”

लेकिन जब वह मिल जाती है, तो क्या इच्छा समाप्त हो जाती है?

कुछ समय के लिए मन प्रसन्न होता है। फिर कुछ नया चाहिए।

फिर वही दौड़ शुरू।

मन कहता है—

“यह मिल जाए…”

फिर—

“अब यह चाहिए…”

और उसके बाद—

“अगर यह भी मिल जाए तो जीवन पूरा हो जाएगा।”

लेकिन जीवन में ऐसी इच्छाओं की कोई निश्चित सीमा दिखाई नहीं देती।

इसलिए संतसेवीजी समझाते हैं कि विषय की प्राप्ति और मन की तृप्ति एक बात नहीं है।

वस्तु मिल सकती है, लेकिन तृष्णा फिर भी बची रह सकती है।

प्यासे को ओस की बूंदों से क्या तृप्ति?

संतसेवीजी इसी बात को समझाने के लिए प्यास का उदाहरण देते हैं।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को बहुत तेज प्यास लगी है। सामने थोड़ी-सी ओस दिखाई देती है। वह ओस की बूंदों को देखकर सोचता है कि शायद इससे मेरी प्यास बुझ जाएगी।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होगा?

नहीं।

जिसे वास्तविक प्यास लगी है, उसे पर्याप्त जल चाहिए।

ठीक इसी तरह मनुष्य के भीतर जो शांति की वास्तविक प्यास है, वह केवल थोड़े-से विषय-सुख से पूरी नहीं हो सकती।

कुछ क्षण का सुख मिल सकता है।

मन थोड़ी देर खुश हो सकता है।

लेकिन भीतर की वह बेचैनी फिर लौट आती है।

इसलिए संतसेवीजी का संदेश है कि हमें क्षणिक सुख और स्थायी शांति के बीच का अंतर समझना चाहिए।

आग में घी डालकर आग बुझती है क्या?

यह बात और भी सरल ढंग से समझिए।

आग जल रही हो और कोई उसे बुझाने के लिए उसमें घी डालने लगे, तो क्या आग शांत होगी?

नहीं।

आग और भड़केगी।

संतसेवीजी इसी प्रकार समझाते हैं कि यदि मन की हर इच्छा को केवल भोग के द्वारा शांत करने की कोशिश की जाए, तो इच्छाओं का अंत जरूरी नहीं है।

एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी खड़ी हो सकती है।

दूसरी पूरी हुई तो तीसरी।

इसलिए मन की समस्या का समाधान केवल “और अधिक प्राप्त कर लेना” नहीं है।

समस्या यह है कि मन सुख को कहाँ खोज रहा है।

मन को केवल रोकना नहीं, उसकी दिशा बदलनी है

यहाँ संतसेवीजी की शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि हम मन से केवल इतना कहें—

“यह मत सोचो, वहाँ मत जाओ, यह मत चाहो…”

तो मन कब तक रुकेगा?

मन को खाली छोड़ देंगे तो वह फिर पुराने रास्ते पर चला जाएगा।

इसलिए मन को किसी श्रेष्ठ दिशा में लगाना होगा।

भजन में लगाना होगा।

सत्संग में लगाना होगा।

ध्यान में लगाना होगा।

परमात्मा के चिंतन में लगाना होगा।

मन को जब भीतर के आनंद का थोड़ा भी अनुभव होने लगेगा, तब उसे बाहर की दौड़ धीरे-धीरे फीकी लगने लगेगी।

एक दिन मन स्वयं पूछेगा—मैं कहाँ भाग रहा हूँ?

संतसेवीजी के प्रवचन की सबसे सुंदर बात यही है कि वे मनुष्य को केवल संसार छोड़ने की शिक्षा नहीं देते, बल्कि मन को समझने की शिक्षा देते हैं।

हम अपने मन को देखें।

वह सुबह से शाम तक कहाँ-कहाँ दौड़ता है?

किस बात से खुश होता है?

किस बात से दुखी होता है?

किस चीज के मिलने की प्रतीक्षा करता है?

किस चीज के छिन जाने से डरता है?

और सबसे बड़ा प्रश्न—

क्या इन सबके बीच उसे वह शांति मिली, जिसकी उसे तलाश है?

यदि उत्तर नहीं है, तो शायद हमें अपनी खोज की दिशा बदलने की जरूरत है।

संतसेवीजी की शिक्षा का सार

पूज्य महर्षि संतसेवी परमहंस महाराज अपने प्रवचन में यही समझाते हैं कि मन को दोष देने से पहले उसकी आदत को समझो।

मन संसार में बहुत पुराना अभ्यस्त है। इसलिए वह बार-बार संसार की ओर भागेगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे बदला नहीं जा सकता।

अभ्यास से मन बदलता है।

सत्संग से उसकी समझ बदलती है।

भजन से उसकी रुचि बदलती है।

ध्यान से उसकी दिशा बदलती है।

और जब मन को भीतर के आनंद का परिचय होने लगता है, तब उसे बार-बार बाहर की वस्तुओं में सुख खोजने की आवश्यकता कम होने लगती है।

तब मन धीरे-धीरे समझता है—

जिस सुख के लिए मैं बाहर-बाहर भटक रहा था, उसकी खोज तो मुझे अपने ही भीतर करनी थी।

यही वह मोड़ है जहाँ से साधना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं रहती, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने वाली यात्रा बन जाती है।

Translate