अध्याय- 8
अक्षरब्रह्म योग श्री गीता योग प्रकाश का आठवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ तथा मृत्यु के समय ईश्वर-स्मरण के गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि जो साधक अंतिम समय में परमात्मा का स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। साथ ही जीवनभर ईश्वर-चिंतन, निष्काम कर्म और अटूट भक्ति के महत्व को भी स्पष्ट किया गया है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 8 (अक्षरब्रह्म योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।
अक्षर ब्रह्मयोग
तन के साथ अनाशी रहता, आत्मतत्व हर तन में।
उससे उच्च ब्रह्म परमाक्षर, बँधा नहीं जो तन में।
तन से बंधी शरिरी आत्मा, यह तो है अध्यात्म ।
सव यज्ञों के अधिपति हैं, सर्वत्र व्याप्त परमात्म ॥153॥
प्राणों को उत्पन करे, व्यापार कर्म कहलाता ।
नाशवान् रूप इस जग में, है अधिभूत कहाता।
नाशवान तन का चेतन, अधिदैव पुरुष कहलाता ।
तन जो तेजे परम प्रभु सुमिरत, जा उनमें मिल जाता ॥154॥