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श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 8


अध्याय- 8

अक्षर ब्रह्मयोग


तन के साथ अनाशी रहता, आत्मतत्व हर तन में।

उससे उच्च ब्रह्म परमाक्षर, बँधा नहीं जो तन में।

तन से बंधी शरिरी आत्मा, यह तो है अध्यात्म ।

सव यज्ञों के अधिपति हैं, सर्वत्र व्याप्त पर‌मात्म ॥153॥



प्राणों को उत्पन करे, व्यापार कर्म कहलाता ।

नाशवान् रूप इस जग में, है अधिभूत कहाता।

नाशवान तन का चेतन, अधिदैव पुरुष कहलाता ।

तन जो तेजे परम प्रभु सुमिरत, जा उनमें मिल जाता ॥154॥

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