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SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

SREE GEETA YOG PRAKASH 

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

कर्म - योग 


कर्म बिना नर कभी न रहता, नर का यही स्वभाव 

राग - व्देष संग में रहने से, सुख क सदा अभाव ।।

जो कर्तव्य मात्र करता है, लोभ लाभ को तजकर ।

उसका लाभ अनंत गुणा है, रक्षक प्रभु को मजकर ।।16॥

 

बिना लोभ उपयुक्त कर्म से, सदा मोक्ष अधिकारी ।

यही कर्म है कर्म - योग, जिसकी महिमा अति भारी ।।

चंचल गति वाला मन भागे, तू मत जाय शरीर ।

धीरे - धीरे मन को साधो, प्रभु हरेगे पीर ।।17॥

 

जो जग का सब कर्म तजोगे, पर हितार्थ सब कर्म ।

बिना कर्म बैठे रहना भी, है भारी दुष्कर्म ।।

जनक, कृष्ण, अवतार सभी, सब संतो को भी देखा ।

सबने कर्म निभाया अपना, रख आदर्श अनोखा ।।18॥

 

कर्मेन्द्रिय से कर्म करे, संयमित रहे मन वशकर ।

क्या यह सुगम महा है, इस माया प्रपंच में फंसकर ।।

क्या यह सुख - साम्राज्य मिलेगा, बस मन को समझाये ।

नही नही यहाँ अगम राह है, सुगम सतगुरु पाये ।।19॥

 

सतगुरु जी बतलाते है, इस मन घोड़े का खूंटा ।

कैसे संध्या ध्यान बने, जिस बिन जग का सुख रूठा ।।

बिना भेंद पाये सतगुरु से, रहे मांग अनबूझा ।

कहाँ शांति मिल पाई किसको, जो अनबूझे जूझा ।।20॥

 

आत्मज्ञान का काम दहन का, कर्मयोग की सिध्दि।

क्या करिये अभ्यास अगर, अज्ञात रहे वह बुध्दि।।

करी त्रिकाल संध्या निज मन में, भक्ति ज्ञान पनपावे ।

आत्मज्ञान से ही मन वश हो, जो सतगुरु मिल जावे ।।21॥

 

इसमें ही कल्याण जगत का, इसके बिन जग सूना ।

यह मारग जो छोड़ दिया तो, दुःख सब नित - नित दूना ।।

इसके बिन परमार्थ न जागे, स्वास्थ्य जग सुख खाये।

ताम - झाम सब कुछ छूंछा है, सब भीतर अकुलावे ।।

 

हुआ समाप्त तृतीय अध्याय ।

प्रभुवर हरदम रहे सहाय ।।

गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।


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