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यह अध्याय “कर्म दर्शन - बंधन से चेतना तक” पुस्तक पर आधारित है।
मनुष्य का जीवन बाहर से जितना
व्यवस्थित दिखाई देता है, भीतर
से उतना ही उलझा हुआ होता है। हम रोज़ असंख्य कर्म करते हैं—कुछ सोचकर, कुछ आदतन, कुछ मजबूरी में, और
बहुत से बिना देखे-समझे। फिर भी, जब जीवन में पीड़ा आती है,
संबंध टूटते हैं, अपराधबोध जन्म लेता है या मन
में खालीपन भरने लगता है, तब हम अक्सर कर्म को नहीं, भाग्य को दोष देते हैं। यहीं से कर्म की सबसे बड़ी गलतफहमी शुरू होती है।
कर्म को हम या तो पुरस्कार-दंड की व्यवस्था मान लेते हैं, या
अच्छे-बुरे की सूची। पर कर्म, अपने गहरे अर्थ में, न तो कानून है और न ही ईश्वरीय लेखा-जोखा। कर्म वह दर्पण है जिसमें मनुष्य
की चेतना स्वयं को देखती है।
सामान्य जीवन में नैतिकता का प्रवेश
अक्सर डर के रास्ते होता है। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि यह करना सही है,
यह गलत। यदि गलत करोगे तो दंड मिलेगा—ईश्वर का, समाज का, कानून का या परिवार का। यह शिक्षा आवश्यक
तो है, पर पर्याप्त नहीं। क्योंकि डर से उपजा सही व्यवहार,
भीतर परिवर्तन नहीं लाता। वह केवल आचरण को नियंत्रित करता है,
चेतना को नहीं। अवसर मिलते ही वही व्यक्ति, जो
नियमों का पालन करता दिखता था, उन्हीं नियमों को तोड़ देता
है। इसीलिए समाज में नैतिकता के इतने उपदेशों के बावजूद, अविश्वास,
हिंसा और शोषण कम नहीं होते।