ज्ञानविज्ञान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 7
ज्ञानविज्ञान योग श्री गीता योग प्रकाश का सातवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (अनुभूत ज्ञान) के वास्तविक स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस अध्याय में वे अपनी अपरा और परा प्रकृति, समस्त सृष्टि के मूल कारण, माया की शक्ति तथा अनन्य भक्ति के महत्व को स्पष्ट करते हैं। भगवान बताते हैं कि उन्हें तत्त्व से जानना केवल बौद्धिक ज्ञान से नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव से संभव है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 7 (ज्ञानविज्ञान योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।
ज्ञान विज्ञान-योग
परमात्मा हैं नित्य और अविनाशी मायातीत।
पृथ्वी बायु अग्नि जल नभ, मन बुद्धि अहं परतीति ॥
अपरा प्रकृति कहाती उनकी,परा प्रकृति है चेतन ।
इन दोनों से पैदा होते, सब प्राणी जड़ चेतन ॥136॥
सभी सृष्टि उत्पन्न व लय हो, परम प्रभू के कारण ।
संरचना सब गुथी हुई है, उनसे सदा अकारण ॥
जल में रस भी परम प्रभू हैं, रवि चन्द्र अग्नि में तेज।
नभ में शब्द, पुरुष में पराक्रम, वेदहिं “ॐ” सतेज ॥137॥