पूजा-पाठ के भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? — सनातन परंपरा, शास्त्र और विज्ञान की दृष्टि से एक शोधपूर्ण अध्ययन
सनातन धर्म में भोजन केवल शरीर का पोषण करने का साधन नहीं माना गया है, बल्कि उसे मन, बुद्धि और आत्मिक जीवन से भी जोड़ा गया है। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने भोजन को केवल स्वाद या पोषण के आधार पर नहीं, बल्कि उसके मानसिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभावों के आधार पर भी वर्गीकृत किया। भारतीय परंपरा में प्रचलित उक्ति "जैसा अन्न, वैसा मन" इसी गहन चिंतन का परिणाम है।
आज भी भारत के अधिकांश मंदिरों, आश्रमों तथा अनेक हिंदू परिवारों में पूजा, हवन, व्रत और भगवान को अर्पित किए जाने वाले नैवेद्य (भोग) में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। बहुत से लोग इसे सनातन धर्म का अटल नियम मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे केवल एक सामाजिक परंपरा बताते हैं। दूसरी ओर, आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद लहसुन तथा प्याज के अनेक औषधीय गुणों का वर्णन करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि ये स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं, तो फिर पूजा-पाठ के भोजन में इनका प्रयोग क्यों नहीं किया जाता?
इस विषय पर चर्चा करते समय दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। पहली, सनातन धर्म अत्यंत व्यापक और विविध परंपराओं वाला धर्म है, इसलिए सभी समुदायों और संप्रदायों के नियम समान नहीं हैं। दूसरी, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले लोकप्रिय मान्यताओं, शास्त्रीय प्रमाणों और आधुनिक शोध—तीनों को संतुलित रूप से समझना चाहिए।
यह लेख इसी उद्देश्य से लिखा गया है कि सनातन परंपरा का सम्मान बनाए रखते हुए इस विषय को पौराणिक, धर्मशास्त्रीय, वैदिक, आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जा सके।
सनातन परंपरा में प्याज और लहसुन से परहेज़ की मान्यता
भारत के अधिकांश वैष्णव मंदिरों, अनेक आश्रमों तथा धार्मिक परिवारों में यह परंपरा है कि भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। यही भोजन बाद में प्रसाद के रूप में भक्तों को वितरित किया जाता है।
इसी प्रकार व्रत, एकादशी, नवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर भी अनेक लोग स्वेच्छा से प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करते। इस परंपरा का मूल उद्देश्य भोजन को सात्त्विक बनाए रखना और साधना, जप, ध्यान तथा पूजा के समय मन को अधिक शांत और संयमित रखना माना जाता है।
यह परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्वभर के अनेक वैष्णव मंदिरों तथा कृष्ण-भक्ति परंपराओं में भी भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। इसलिए यह कहना उचित होगा कि यह परंपरा सनातन धर्म के एक बड़े वर्ग द्वारा लंबे समय से अपनाई जाती रही है।
हालाँकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सभी हिंदू समुदायों में यह नियम समान रूप से लागू नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों, परंपराओं और संप्रदायों में इसके पालन की विधि अलग-अलग मिलती है।
पौराणिक मान्यता : समुद्र मंथन और राहु-केतु की कथा
इस विषय से जुड़ी सबसे लोकप्रिय धार्मिक मान्यता समुद्र मंथन की कथा से संबंधित है। भागवत पुराण, विष्णु पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में समुद्र मंथन का विस्तृत वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार जब देवताओं और दैत्यों द्वारा समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त हुआ, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत वितरित किया।
इसी समय स्वर्भानु नामक दैत्य देवता का रूप धारण करके अमृत पीने बैठ गया। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत का स्पर्श होने के कारण उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया।
लोकमान्यता के अनुसार, जहाँ-जहाँ उसके रक्त की बूंदें गिरीं, वहाँ प्याज और लहसुन उत्पन्न हुए। इसी कारण इनमें औषधीय गुण तो माने गए, परंतु इन्हें पूजा और भगवान के नैवेद्य में स्वीकार नहीं किया गया।
यह कथा भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है और धार्मिक प्रवचनों में भी सुनाई जाती है। किंतु यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस रूप में प्याज और लहसुन की उत्पत्ति का वर्णन सभी प्रमुख पुराणों में समान रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे एक लोकप्रिय पौराणिक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि सभी शास्त्रों द्वारा समान रूप से स्थापित सिद्धांत के रूप में।
यही कारण है कि गंभीर शोध करने वाले विद्वान इस कथा का उल्लेख करते समय इसे "लोकमान्यता" या "परंपरागत धार्मिक विश्वास" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
सनातन धर्म में भोजन और मन का संबंध
सनातन दर्शन का मूल सिद्धांत है कि मनुष्य का भोजन उसके शरीर के साथ-साथ उसके मन और व्यवहार को भी प्रभावित करता है। यही कारण है कि उपनिषदों, योगदर्शन तथा भगवद्गीता में संयमित जीवन और शुद्ध आहार पर विशेष बल दिया गया है।
पूजा का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता, श्रद्धा और ईश्वर के प्रति समर्पण है। इसलिए ऐसे भोजन को प्राथमिकता दी गई जो हल्का, स्वच्छ, पचने में सरल और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना गया।
इसी आधार पर धीरे-धीरे अनेक धार्मिक परंपराओं में नैवेद्य और प्रसाद के लिए विशेष प्रकार के सात्त्विक भोजन की परंपरा विकसित हुई। दूध, दही, घी, फल, अनाज, दालें, मेवे, गुड़, शहद और ताज़ी सब्जियाँ इस श्रेणी में प्रमुख रूप से सम्मिलित किए गए, जबकि प्याज और लहसुन को अनेक परंपराओं ने इससे अलग रखा।
यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी खाद्य पदार्थ को 'अशुभ' घोषित करना नहीं, बल्कि पूजा के लिए एक विशेष प्रकार की आध्यात्मिक अनुशासन-परंपरा का पालन करना था।
वैदिक दृष्टिकोण : क्या वेदों में प्याज और लहसुन का स्पष्ट निषेध है?
जब भी इस विषय पर चर्चा होती है, सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि क्या चारों वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—में कहीं स्पष्ट रूप से लिखा है कि पूजा या यज्ञ में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए?
उपलब्ध वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वेदों में ऐसा कोई प्रत्यक्ष मंत्र नहीं मिलता, जिसमें प्याज (पलाण्डु) या लहसुन (लशुन/रसोन) का नाम लेकर उन्हें पूजा या यज्ञ के लिए निषिद्ध घोषित किया गया हो। वेद मुख्यतः यज्ञ, अग्नि, हवि, घृत, दूध, दही, जौ, तिल, अन्न, सोम, जल तथा अन्य यज्ञीय सामग्रियों का वर्णन करते हैं। उनका प्रमुख उद्देश्य आध्यात्मिक सिद्धांतों, देवताओं की स्तुति, यज्ञ-विधान और जीवन-दर्शन का प्रतिपादन है।
इसका अर्थ यह नहीं कि वेद प्याज और लहसुन के सेवन का समर्थन करते हैं, बल्कि इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इनका स्पष्ट निषेध वेदों में उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस विषय को केवल "वैदिक आदेश" कह देना शास्त्रीय दृष्टि से पूर्णतः सटीक नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि अनेक आधुनिक संस्कृत विद्वान और धर्मशास्त्र के शोधकर्ता यह मानते हैं कि प्याज और लहसुन से संबंधित धार्मिक नियमों का व्यवस्थित विकास उत्तरवैदिक काल में हुआ, जब स्मृतियाँ, धर्मसूत्र, पुराण और आगमिक परंपराएँ विकसित हुईं।
धर्मशास्त्रों और स्मृतियों का दृष्टिकोण
वेदों के बाद भारतीय धर्मव्यवस्था को व्यवस्थित करने में धर्मसूत्रों और स्मृतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन ग्रंथों में केवल पूजा-पद्धति ही नहीं, बल्कि आचार-विचार, आहार-विहार, सामाजिक जीवन और धार्मिक अनुशासन के अनेक नियम बताए गए हैं।
इन्हीं ग्रंथों में कुछ स्थानों पर लहसुन (लशुन) और प्याज (पलाण्डु) का उल्लेख मिलता है।
मनुस्मृति का उल्लेख
मनुस्मृति के पाँचवें अध्याय में ब्राह्मणों तथा धार्मिक आचार का पालन करने वालों के लिए कुछ खाद्य पदार्थों से बचने का उल्लेख मिलता है। यहाँ लशुन (लहसुन), पलाण्डु (प्याज), कुछ प्रकार के कवक (मशरूम) तथा अन्य पदार्थों का उल्लेख किया गया है।
हालाँकि विद्वानों के बीच इस विषय पर मतभेद है। कुछ विद्वानों का मत है कि ये नियम सभी लोगों के लिए नहीं थे, बल्कि विशेष रूप से यज्ञ करने वाले, वेदाध्यायी, ब्रह्मचारी अथवा कठोर धार्मिक अनुशासन का पालन करने वाले व्यक्तियों के लिए थे। इसलिए इन श्लोकों की व्याख्या संदर्भ सहित करना आवश्यक है।
याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य ग्रंथ
याज्ञवल्क्य स्मृति तथा कुछ अन्य धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में भी व्रत, यज्ञ और शुद्धाचार के समय कुछ खाद्य पदार्थों से बचने का निर्देश मिलता है। इनका उद्देश्य व्यक्ति के आचरण और मानसिक अनुशासन को बनाए रखना था।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन ग्रंथों का उद्देश्य स्वास्थ्य-विज्ञान नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और आध्यात्मिक साधना था। इसलिए इनके नियमों को उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
भगवद्गीता का सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भोजन को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।
सात्त्विक भोजन को आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाने वाला बताया गया है। राजसिक भोजन अत्यधिक कड़वा, खट्टा, नमकीन, तीखा, गरम और उत्तेजक बताया गया है, जबकि तामसिक भोजन बासी, दुर्गंधयुक्त, रसहीन तथा अपवित्र माना गया है।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवद्गीता कहीं भी प्याज या लहसुन का नाम लेकर उन्हें राजसिक या तामसिक नहीं कहती।
बाद की वैष्णव, योग तथा भक्ति परंपराओं ने इन दोनों पदार्थों को उनके प्रभाव और साधना की दृष्टि से राजसिक अथवा तामसिक श्रेणी में रखना आरम्भ किया। यही व्याख्या आज अधिकांश मंदिरों और आश्रमों में प्रचलित है।
अतः यह समझना आवश्यक है कि गीता सिद्धांत देती है, जबकि बाद की परंपराएँ उन सिद्धांतों का व्यवहारिक अनुप्रयोग प्रस्तुत करती हैं।
आगमिक और मंदिर परंपराएँ
भारत के अधिकांश प्राचीन मंदिर केवल वैदिक विधियों पर आधारित नहीं हैं। विशेषकर वैष्णव, शैव और शाक्त मंदिरों में पूजा-पद्धति का आधार आगम और तंत्र साहित्य भी है।
वैष्णव मंदिरों में भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले नैवेद्य में सामान्यतः प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। इसका कारण यह माना जाता है कि भगवान को केवल सात्त्विक भोजन अर्पित किया जाए।
समय के साथ यह परंपरा मंदिरों से निकलकर सामान्य गृहस्थ जीवन में भी पहुँच गई। परिणामस्वरूप अनेक परिवारों में आज भी पूजा, व्रत, संकल्प, जप, हवन तथा विशेष धार्मिक अवसरों पर बिना प्याज-लहसुन का भोजन बनाया जाता है।
यह परंपरा विशेष रूप से वैष्णव संप्रदायों में अधिक दृढ़ता से दिखाई देती है, जबकि अन्य संप्रदायों में इसके पालन की कठोरता अलग-अलग हो सकती है।
क्या यह नियम सभी हिंदुओं पर समान रूप से लागू होता है?
इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।
सनातन धर्म किसी एक केंद्रीकृत धार्मिक संस्था द्वारा संचालित नहीं होता। इसमें अनेक दर्शन, संप्रदाय और क्षेत्रीय परंपराएँ हैं।
उदाहरण के लिए, अनेक वैष्णव परिवार वर्षभर प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करते। कुछ परिवार केवल पूजा और व्रत के दिनों में इनका त्याग करते हैं। वहीं कुछ शैव और शाक्त परंपराओं में इसका पालन अलग प्रकार से होता है। दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्रों में भी स्थानीय परंपराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न व्यवहार देखने को मिलता है।
इसलिए यह कहना कि "हर हिंदू के लिए हर समय प्याज और लहसुन निषिद्ध हैं" शास्त्रीय और सामाजिक दोनों दृष्टियों से सही निष्कर्ष नहीं होगा।
हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पूजा, नैवेद्य और सात्त्विक भोजन के संदर्भ में प्याज और लहसुन का त्याग सनातन धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और व्यापक रूप से सम्मानित परंपरा है, विशेषकर वैष्णव और अनेक मंदिर-परंपराओं में।
आयुर्वेद का दृष्टिकोण : निषिद्ध भोजन नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण औषधि
इस विषय में सबसे अधिक भ्रम आयुर्वेद को लेकर होता है। अनेक लोग यह मान लेते हैं कि यदि पूजा में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता, तो आयुर्वेद भी इन्हें हानिकारक या निषिद्ध मानता होगा। वास्तव में ऐसा नहीं है।
आयुर्वेद में लहसुन (रसोन/लशुन) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके अनेक औषधीय गुणों का वर्णन मिलता है। इसे वातनाशक, कृमिनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लिए हितकारी तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना गया है। इसी प्रकार प्याज के भी अनेक औषधीय उपयोग बताए गए हैं।
अर्थात् आयुर्वेद इन दोनों को सामान्य परिस्थितियों में वर्जित नहीं मानता, बल्कि उचित मात्रा और उचित परिस्थिति में लाभकारी मानता है।
यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। धर्मशास्त्र और आयुर्वेद के उद्देश्य अलग-अलग हैं। आयुर्वेद का उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना है, जबकि पूजा-पाठ और साधना का उद्देश्य मन, इन्द्रियों और चित्त को अधिक संयमित तथा एकाग्र बनाना है। इसलिए जो पदार्थ चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी हो, वह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में भी उपयुक्त माना जाए।
योग और ध्यान की दृष्टि
योग परंपरा में भोजन को साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। पतंजलि योगसूत्र भोजन की सूची नहीं देता, परंतु योग की परंपराओं में ऐसा भोजन लेने पर बल दिया गया है जो शरीर को हल्का और मन को स्थिर बनाए।
इसी आधार पर अनेक योग परंपराओं ने प्याज और लहसुन को ऐसा आहार माना जो इन्द्रियों को अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय या उत्तेजित कर सकता है। इस कारण गहन ध्यान, जप और दीर्घकालीन साधना के समय इनसे बचने की सलाह दी गई।
यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आध्यात्मिक अनुशासन (Spiritual Discipline) का विषय है, न कि किसी खाद्य पदार्थ के अच्छे या बुरे होने का अंतिम निर्णय।
आधुनिक विज्ञान क्या कहता है?
आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार प्याज और लहसुन में अनेक लाभकारी जैव सक्रिय (Bioactive) तत्व पाए जाते हैं। विशेष रूप से लहसुन में उपस्थित एलिसिन (Allicin) तथा सल्फर यौगिकों पर व्यापक अध्ययन हुए हैं।
अनुसंधानों से संकेत मिलता है कि ये पदार्थ हृदय स्वास्थ्य, रक्तचाप नियंत्रण, कोलेस्ट्रॉल प्रबंधन, संक्रमण से सुरक्षा तथा प्रतिरक्षा प्रणाली के समर्थन में सहायक हो सकते हैं। प्याज में भी एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं जो सामान्य स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
इसलिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इन दोनों खाद्य पदार्थों को संतुलित आहार का उपयोगी भाग मानता है।
यहाँ भी वही अंतर समझना आवश्यक है—स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होना और पूजा के नैवेद्य के लिए उपयुक्त होना, दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं।
क्या भगवान प्याज-लहसुन वाला भोजन स्वीकार नहीं करते?
यह प्रश्न श्रद्धा से जुड़ा है और इसका उत्तर विभिन्न संप्रदायों में भिन्न-भिन्न मिलता है।
वैष्णव परंपरा का मत है कि भगवान को सात्त्विक भोजन ही अर्पित किया जाना चाहिए। इसलिए वहाँ प्याज और लहसुन रहित भोजन ही नैवेद्य के रूप में स्वीकार किया जाता है।
दूसरी ओर, सनातन धर्म के कुछ अन्य संप्रदायों और स्थानीय परंपराओं में इस विषय में अलग-अलग व्यवहार देखने को मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह विषय संप्रदायगत आचार का भी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू धर्मग्रंथ बार-बार भाव (श्रद्धा), भक्ति और शुद्ध अंतःकरण को सर्वोच्च महत्व देते हैं। इसलिए भोजन की शुद्धता के साथ-साथ मन की शुद्धता भी समान रूप से आवश्यक मानी गई है।
सामान्य भ्रांतियाँ
इस विषय में कुछ सामान्य भ्रांतियाँ प्रचलित हैं, जिन्हें स्पष्ट करना आवश्यक है।
पहली भ्रांति यह है कि वेदों ने स्पष्ट रूप से प्याज और लहसुन खाने पर प्रतिबंध लगाया है। उपलब्ध वैदिक साहित्य में ऐसा प्रत्यक्ष निषेध नहीं मिलता।
दूसरी भ्रांति यह है कि आयुर्वेद इन्हें हानिकारक मानता है। वास्तव में आयुर्वेद दोनों के अनेक औषधीय गुणों का वर्णन करता है।
तीसरी भ्रांति यह है कि सभी हिंदुओं के लिए हर समय प्याज और लहसुन खाना निषिद्ध है। व्यवहार में ऐसा नहीं है। विभिन्न संप्रदायों और परिवारों में अलग-अलग परंपराएँ प्रचलित हैं।
चौथी भ्रांति यह है कि जो व्यक्ति प्याज और लहसुन खाता है, उसकी पूजा स्वीकार नहीं होती। ऐसा कोई सार्वभौमिक शास्त्रीय विधान उपलब्ध नहीं है। हाँ, अनेक परंपराएँ पूजा, व्रत और नैवेद्य के समय इनके त्याग की सलाह अवश्य देती हैं।
निष्कर्ष
पूजा-पाठ के भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग न करने की परंपरा सनातन धर्म की एक प्राचीन और सम्मानित धार्मिक परंपरा है। इसका आधार मुख्यतः धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, आगमिक परंपराएँ, वैष्णव आचार तथा साधना की सात्त्विक परंपरा में मिलता है।
दूसरी ओर, चारों वेदों में इनका स्पष्ट निषेध उपलब्ध नहीं है। भगवद्गीता भी इनका नाम लेकर इन्हें तामसिक या राजसिक नहीं कहती। आयुर्वेद इन्हें अनेक रोगों में उपयोगी औषधि के रूप में स्वीकार करता है।
अतः यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि प्याज और लहसुन का त्याग मुख्यतः धार्मिक अनुशासन, साधना, सात्त्विक जीवन और मंदिर-परंपराओं से संबंधित है, न कि केवल स्वास्थ्य अथवा केवल वैदिक आदेश का विषय।
सनातन धर्म की विशेषता यही है कि वह विविध परंपराओं का सम्मान करते हुए साधक को विवेकपूर्ण आचरण का मार्ग दिखाता है। यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष संप्रदाय या पारिवारिक परंपरा का पालन करता है, तो उसके लिए उन नियमों का पालन श्रद्धा का विषय है। वहीं अन्य लोग यदि सामान्य भोजन में प्याज और लहसुन का सेवन करते हैं, तो आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से भी उसके अपने संदर्भ हैं।
अंततः पूजा का मूल उद्देश्य केवल भोजन की शुद्धता नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, श्रद्धा, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण है। जब सात्त्विक आहार, सदाचार और निष्काम भक्ति एक साथ जुड़ते हैं, तभी पूजा का वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप पूर्ण होता है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अध्ययन सामग्री
इस लेख की तैयारी में सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, धर्मशास्त्रों, आयुर्वेदिक साहित्य तथा आधुनिक शोध सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। विषय की प्रकृति को देखते हुए विभिन्न ग्रंथों में उपलब्ध संदर्भों को उनके मूल संदर्भ (Context) के साथ समझने का प्रयास किया गया है।
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श्रीमद्भगवद्गीता (विशेषतः अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभाग योग) – सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक आहार का सिद्धांत।
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मनुस्मृति (अध्याय 5) – आहार, शुद्धाचार एवं धार्मिक अनुशासन से संबंधित प्रावधान।
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याज्ञवल्क्य स्मृति – आचार, व्रत, शौच एवं धार्मिक जीवन से संबंधित नियम।
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चरक संहिता – आहार-विज्ञान, द्रव्यगुण तथा लहसुन (रसोन/लशुन) सहित विभिन्न औषधीय वनस्पतियों का वर्णन।
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सुश्रुत संहिता – औषधीय द्रव्यों, आहार एवं स्वास्थ्य संबंधी सिद्धांत।
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विष्णु पुराण – समुद्र मंथन तथा राहु-केतु प्रसंग।
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श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध) – समुद्र मंथन का विस्तृत वर्णन।
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महाभारत (आदि पर्व) – समुद्र मंथन एवं अमृत वितरण का प्रसंग।
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धर्मसूत्र एवं गृह्यसूत्र साहित्य – धार्मिक आचार एवं शुद्धाचार संबंधी परंपराओं के अध्ययन हेतु।
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आधुनिक आयुर्वेदिक एवं पोषण-विज्ञान संबंधी शोध-पत्र, जिनमें लहसुन (Garlic) और प्याज (Onion) के औषधीय एवं पोषण संबंधी गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण
इस विषय पर विभिन्न संप्रदायों, परंपराओं और विद्वानों के मतों में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं। विशेष रूप से समुद्र मंथन से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति संबंधी कथा व्यापक लोकमान्यता का भाग है, किंतु यह सभी प्रमुख पुराणों में समान रूप से वर्णित नहीं है। इसी प्रकार चारों वेदों में पूजा के लिए प्याज और लहसुन का प्रत्यक्ष निषेध उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस लेख में जहाँ भी आवश्यक था, वहाँ लोकमान्यता, धर्मशास्त्रीय परंपरा, वैदिक साहित्य, आयुर्वेद तथा आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोणों को अलग-अलग प्रस्तुत किया गया है।
लेखक का उद्देश्य किसी धार्मिक परंपरा का समर्थन या खंडन करना नहीं, बल्कि उपलब्ध शास्त्रीय, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक स्रोतों के आधार पर विषय का संतुलित एवं शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत करना है। सनातन धर्म की विविध परंपराओं का सम्मान करते हुए पाठकों से अपेक्षा है कि वे अपने गुरु, आचार्य, पारिवारिक परंपरा तथा व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार आचरण करें।