गीता – एक परिचय (Introduction of the Bhagavad Gita)
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा का वह अमूल्य ग्रंथ है जिसने हजारों वर्षों से मानवता को सत्य, धर्म, कर्म और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया है। संस्कृत में रचित यह दिव्य ग्रंथ महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय 23 से 40) का एक अभिन्न अंग है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य हुआ दिव्य संवाद संकलित है।
गीता का आरम्भ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से होता है। जब पाण्डव और कौरव धर्मयुद्ध के लिए आमने-सामने खड़े होते हैं, तब अर्जुन अपने ही गुरुजनों, बंधु-बांधवों और स्वजनों को देखकर मोह, करुणा और विषाद से भर उठते हैं। वे अपने क्षत्रिय धर्म और मानवीय संवेदनाओं के बीच गहरे द्वंद्व में पड़ जाते हैं तथा युद्ध से विमुख होने का विचार करते हैं। इसी संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण उन्हें धर्म, आत्मा, कर्म, भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का जो उपदेश देते हैं, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में विश्वविख्यात हुआ।
भगवद्गीता केवल युद्धभूमि का उपदेश नहीं है, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आने वाले नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक संघर्षों का समाधान प्रस्तुत करने वाला कालजयी ग्रंथ है। इसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग तथा राजयोग का अद्भुत समन्वय मिलता है। गीता यह सिखाती है कि मनुष्य को फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए तथा समत्व, आत्मसंयम और ईश्वर-समर्पण के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में गीता का अत्यंत उच्च स्थान है। इसे प्रस्थानत्रयी का एक प्रमुख ग्रंथ माना जाता है, जिसमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता सम्मिलित हैं। गीता उपनिषदों की ब्रह्मविद्या को स्वीकार करते हुए उसे कर्मयोग और लोककल्याण की दृष्टि से और अधिक व्यावहारिक रूप प्रदान करती है। इसी कारण इसे केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का सर्वोत्तम मार्गदर्शक भी कहा जाता है।
गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गाय और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका आशय यह है कि उपनिषदों के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का सार अत्यंत सरल, सुबोध और व्यवहारिक रूप में गीता में उपलब्ध होता है। भगवान श्रीकृष्ण का संदेश—"समत्वं योग उच्यते" तथा "योगः कर्मसु कौशलम्"—आज भी मानव जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
गीता का संदेश किसी एक धर्म, संप्रदाय या युग तक सीमित नहीं है। यह सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन का सार्वभौमिक दर्शन प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, विनोबा भावे सहित अनेक महान दार्शनिकों, संतों और विचारकों ने गीता पर अपने-अपने दृष्टिकोण से भाष्य लिखे हैं। महात्मा गांधी ने तो गीता को अपना "आध्यात्मिक शब्दकोश (Spiritual Dictionary)" कहा था।
आज भी गीता का प्रत्येक अध्याय मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी धैर्य, विवेक, निष्काम कर्म, श्रद्धा और ईश्वर-विश्वास को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जीवन के लिए प्रेरणा, आत्मबल और आध्यात्मिक उत्थान का शाश्वत स्रोत है।














