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INTRODUCTION OF GEETA (गीता - एक परिचय)

गीता – एक परिचय (Introduction of the Bhagavad Gita)

श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा का वह अमूल्य ग्रंथ है जिसने हजारों वर्षों से मानवता को सत्य, धर्म, कर्म और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया है। संस्कृत में रचित यह दिव्य ग्रंथ महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय 23 से 40) का एक अभिन्न अंग है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य हुआ दिव्य संवाद संकलित है।

गीता का आरम्भ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से होता है। जब पाण्डव और कौरव धर्मयुद्ध के लिए आमने-सामने खड़े होते हैं, तब अर्जुन अपने ही गुरुजनों, बंधु-बांधवों और स्वजनों को देखकर मोह, करुणा और विषाद से भर उठते हैं। वे अपने क्षत्रिय धर्म और मानवीय संवेदनाओं के बीच गहरे द्वंद्व में पड़ जाते हैं तथा युद्ध से विमुख होने का विचार करते हैं। इसी संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण उन्हें धर्म, आत्मा, कर्म, भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का जो उपदेश देते हैं, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में विश्वविख्यात हुआ।

भगवद्गीता केवल युद्धभूमि का उपदेश नहीं है, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आने वाले नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक संघर्षों का समाधान प्रस्तुत करने वाला कालजयी ग्रंथ है। इसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग तथा राजयोग का अद्भुत समन्वय मिलता है। गीता यह सिखाती है कि मनुष्य को फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए तथा समत्व, आत्मसंयम और ईश्वर-समर्पण के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

भारतीय दार्शनिक परंपरा में गीता का अत्यंत उच्च स्थान है। इसे प्रस्थानत्रयी का एक प्रमुख ग्रंथ माना जाता है, जिसमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता सम्मिलित हैं। गीता उपनिषदों की ब्रह्मविद्या को स्वीकार करते हुए उसे कर्मयोग और लोककल्याण की दृष्टि से और अधिक व्यावहारिक रूप प्रदान करती है। इसी कारण इसे केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का सर्वोत्तम मार्गदर्शक भी कहा जाता है।

गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गाय और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका आशय यह है कि उपनिषदों के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का सार अत्यंत सरल, सुबोध और व्यवहारिक रूप में गीता में उपलब्ध होता है। भगवान श्रीकृष्ण का संदेश—"समत्वं योग उच्यते" तथा "योगः कर्मसु कौशलम्"—आज भी मानव जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।

गीता का संदेश किसी एक धर्म, संप्रदाय या युग तक सीमित नहीं है। यह सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन का सार्वभौमिक दर्शन प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, विनोबा भावे सहित अनेक महान दार्शनिकों, संतों और विचारकों ने गीता पर अपने-अपने दृष्टिकोण से भाष्य लिखे हैं। महात्मा गांधी ने तो गीता को अपना "आध्यात्मिक शब्दकोश (Spiritual Dictionary)" कहा था।

आज भी गीता का प्रत्येक अध्याय मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी धैर्य, विवेक, निष्काम कर्म, श्रद्धा और ईश्वर-विश्वास को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जीवन के लिए प्रेरणा, आत्मबल और आध्यात्मिक उत्थान का शाश्वत स्रोत है।

स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि

"श्री गीता योग प्रकाश" के माध्यम से स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, भावपूर्ण और जनसुलभ काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने का अनुपम प्रयास किया। उनकी लेखनी केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना, गीता के प्रति अटूट श्रद्धा और मानव कल्याण की भावना का साकार रूप है।

उन्होंने गीता के गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को सहज भाषा और पद्यात्मक शैली में इस प्रकार प्रस्तुत किया कि सामान्य पाठक भी उसके आध्यात्मिक संदेश को सरलता से समझ सके। उनकी यह कृति धर्म, कर्म, भक्ति, ज्ञान और आत्मबोध की दिशा में प्रत्येक साधक के लिए प्रेरणास्रोत है तथा भारतीय आध्यात्मिक साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है।


1. INTRODUCTION OF GEETA (गीता - एक परिचय)
2. अर्जुन विषाद योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1
3. सांख्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2
4. कर्म - योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3
5. ज्ञान - कर्म - संन्यास योग -श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 4
6. कर्म सन्यास योंग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 5
7. ध्यान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 6 - (हिन्दी पदानुवाद)
8. ज्ञानविज्ञान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 7
9. अक्षरब्रह्म योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 8
10. राजविद्याराजगुह्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 9
11. विभूति योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10
12. विश्वरूपदर्शन योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 11
13. भक्तियोग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 12
14. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13
15. गुणत्रयविभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 14
16. पुरुषोत्तम योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15
17. दैवासुरसम्पद्विभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 16
18. श्रद्धात्रय विभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 17
19. सन्यास योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 18

अर्जुन विषाद योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

 श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

अर्जुन विषाद योग श्री गीता योग प्रकाश का प्रथम अध्याय है, जो श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अपने ही स्वजनों, गुरुजनों और संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन मोह, करुणा और विषाद से व्याकुल हो उठते हैं। यही मानसिक द्वंद्व भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का कारण बनता है। यह अध्याय मानव जीवन में उत्पन्न होने वाले नैतिक संघर्ष, कर्तव्य और भावनाओं के टकराव का सजीव चित्रण करता है तथा आत्मज्ञान की यात्रा का प्रथम चरण माना जाता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, काव्यात्मक पदानुवाद, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवनोपयोगी संदेश सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

  अर्जुन विषाद योग

बहुत दिनो की बात हुई यह बात है अमर कहानी ।

पांच हजार बरस बीते है, फिर भी नहीं पुरानी ।।

लिया जन्म भगवान कृष्ण ने, धन्य हुई यह धरनी ।

युद्ध किया कौरव पाण्डव ने, कथा विषय यह वरनी ।। 1॥

 

युद्ध भूमी में , पाण्डव दल में, अर्जुन के कोचवान ।

सारथि र्धम निभाया प्रभु  ने, धन्य धन्य भगवान ।।

दुर्योधन थे कौरव दल मेंमहाबली गुणवान ।

वृद्ध पिता धृतराष्ट्र थे उनके, स्वामी सहज सुजान ।। 2॥

 

नहीं जा सके युद्ध भूमी में, नयन बिना लाचार ।

समाचार संजय से सुनते, और युद्ध संचार ।।

युद्ध हुआ होने के तत्पर, अर्जुन करे विचार ।

उभय पक्ष के बीच खडे़ हो, प्रभु से किया गोहार।।3॥

सांख्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

सांख्य योग श्री गीता योग प्रकाश का दूसरा अध्याय है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता का दार्शनिक आधार माना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, कर्तव्यपालन, समत्व, बुद्धियोग और निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं। यही अध्याय आगे आने वाले सभी अध्यायों की मूल आधारशिला भी है। भगवान बताते हैं कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव रखते हुए अपने स्वधर्म का पालन करना ही सच्चा योग है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 2 (सांख्य योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।


सांख्य योग



युद्ध क्षेत्र में खडे़ हुये हो, यह तो समय विषम है ।

मोह कहॉं से आया अर्जुन, अपयशदायक मन है ।।

पण्डित ज्ञानी सम तव वाणी, मोह न मन में लाओ ।

यह न शोक का समय, करो कर्त्तव्य, वहीं बस ध्यावो ।। 6

 

सब थे पहले, फिर भी होंगे, चलता चक्र पुराना ।

जो भी जन्म लिया मरता है, नया ही बने पुराना ।।

इस तन में है आत्मा, अमर और अविनाशी ।

बसन बदलना होता रहता, क्या मगहर क्या काशी ।।7

 

जो है निश्चित, शोक न करना, सत्य सदा अविनाशी ।

धर्म युद्ध में युद्ध करो हे, कीर्ति मिले अविनाशी ।।

मृत्यु -मिलन का शोक न करना, स्वर्ग मिलेगा तत्क्षण ।

कष्ट अगर इन्द्रिन को होगा, सहते जाना हर क्षण ।।8

 

दुःख सुख में मन को सम रखना, हे मेरे वरवीर ।

ये तो नित्य नही रहते है, मत आतुर हो धीर ।।

समता में रहने वाले को, कभी न लगता पाप ।

सांख्य योग प्रारम्भ हुआ तो, नाश न हो परताप ।।9

 

कर्म - योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3
कर्म - योग 

कर्म योग श्री गीता योग प्रकाश का तीसरा अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण निष्काम कर्म, कर्तव्य पालन और लोकसंग्रह के सिद्धांत का गहन उपदेश देते हैं। इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य कर्म किए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, इसलिए उसे फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि निष्काम कर्म ही आत्मशुद्धि, समाज-कल्याण और अंततः मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 3 (कर्म योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।

कर्म बिना नर कभी न रहता, नर का यही स्वभाव 

राग - व्देष संग में रहने से, सुख क सदा अभाव ।।

जो कर्तव्य मात्र करता है, लोभ लाभ को तजकर ।

उसका लाभ अनंत गुणा है, रक्षक प्रभु को मजकर ।।16॥

 

बिना लोभ उपयुक्त कर्म से, सदा मोक्ष अधिकारी ।

यही कर्म है कर्म - योग, जिसकी महिमा अति भारी ।।

चंचल गति वाला मन भागे, तू मत जाय शरीर ।

धीरे - धीरे मन को साधो, प्रभु हरेगे पीर ।।17॥

 

ज्ञान - कर्म - संन्यास योग -श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 4

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय - 4
ज्ञान - कर्म - संन्यास योग 


ज्ञान-कर्म-संन्यास योग श्री गीता योग प्रकाश का चौथा अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण दिव्य ज्ञान, निष्काम कर्म, अवतार का उद्देश्य तथा कर्म के रहस्य का विस्तृत विवेचन करते हैं। इस अध्याय में भगवान बताते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे धर्म की स्थापना के लिए अवतार धारण करते हैं। साथ ही ज्ञान, कर्म और त्याग के समन्वय द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी स्पष्ट किया गया है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 4 (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।


ज्ञान कर्म संन्यास योंग का, वर्णन बहुत पुराना 

पहले प्रभु ने रवि को सुनाया, तनय मनु ने जाना ।।

इक्ष्वाकु थे तनय मनु के मनु ने उन्हें बताया 

इसी भांति राजश्री सभी, और मुनियों ने भी पाया ।।23॥

 

फिर से भगवन ने अर्जुन को, यही ज्ञान बतलाया 

हुआ प्रचार पुन: तन मन से, हम सबने भी पाया ।।

बार - बार के जन्म - मरण का, चक्र सदा चलता है 

पर कुछ याद नही रहता है, इससे यह खलता है ।।24॥

 

 

भगवत कृष्ण महायोगेश्वर, उनकी स्मृति नित नूतन 

मायापति माया वश में रख, करे कार्य सम्पादन ।।

माया के वश जन्म - मरण से, रहते नर अज्ञानी 

मायापति  का जन्म दिव्य, वे अमरात्मा के ज्ञानी।।25॥

कर्म सन्यास योंग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 5

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय - 5 

कर्मसंन्यास योग श्री गीता योग प्रकाश का पाँचवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्मसंन्यास के वास्तविक स्वरूप का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि निष्काम भाव से किया गया कर्म, बाह्य संन्यास से भी श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही सच्चा कर्मयोगी और संन्यासी है। भगवान श्रीकृष्ण कर्म, ज्ञान, वैराग्य, आत्मसंयम और समत्व के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं। प्रस्तुत लेख में अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।

कर्म सन्यास योंग 

 

कर्मयोग, सन्यासयोंग, दोनों आपस में पूरक 

द्वेषहीन, इच्छाविहीन, सुख -  दुःख  में कभी न हो तो रत ।।

ऐसे ही सन्यासी, जिनका अविरल कर्म स्वभाव 

अति गतिशील चक्र में लखता, स्थिरता का भाव ।।52॥

 

परम लक्ष्य में तत्परता से, सदा निरत सन्यासी 

उसका कर्म अतुल्य महा है, कर्मयोग अभ्यासी ।।

जैसे रवि दिन -रात पथिक, पर कर्म न करते कोई 

उनका अति उपकार परम, परमार्थ न जग में गोई ।।53॥


 

सन्यासी का वेश धरे, या घर ग्रहस्थ का योगी 

ज्ञान कर्म संयास योंग से, पूर्ण गृहस्थ का योगी ।।

धीरे - धीरे ही बनता जायेगा, पूर्ण साधना होगी।

मन का मैल कामना भागे, स्थितप्रज्ञता जागी ।।54॥

 

मन मंडल में मन बुध्दी चित्त संग, अहंकार की दौड़ 

त्रिकुटी के आगे दौड़ न होती, ररंकार के ठौर ।।

इच्छाओ को रोक सके स्थायी, मात्र विचार 

ऐसा नही कभी हो सकता, यह अति बली विकार ।।55॥

 

ध्यानाभ्यास करे दृढ़ होकर, दृढ़ता करे विचार 

उर्ध्वगति सूरत की होगी, हित मन मंडल पार ।।

मन लय होगा, इच्छाओ का लय भी होवे तत्क्षण 

रंरकार का शब्द मिले तो, अनहद होवे रक्षण ।।56॥

 

संकट में भी पूरी समता, का हो अचल स्वभाव 

संस्कार, इन्द्रिय - निग्रह हो, तभी बने यह भाव ।।

कठिन परिश्रम युग - युग करिये, ध्यान सतगुरु पाये।

ज्ञान , कर्म, सन्यास, योंग से, जन्म सफल हो जाये ।।57॥

 

सांख्य की निष्ठा वाले करते, श्रवण मनन स्वाध्याय 

हो परोक्ष अध्यात्मज्ञान, अनिवार्य सदा स्वाध्याय ।।

कर्म योगियों की खातिर भी, यह सदा रहे अनिवार्य 

ध्यानयोंग ही पूर्ण बनावे, प्राणायाम है वार्य।।58॥

 

ध्यानयोंग की उपासना बिन, लँगड़े और अपूर्ण 

सांख्यनिष्ठ या कर्मनिष्ठ हो, योंग न ही सम्पूर्ण ।।

केवल घोषित कर देने से, सत्य नही बदलेगा 

यथार्थता नहि मिल पाई तो, मात्र डींग क्या देगा ।।59॥

 

वाक्य ज्ञान में निपुण मनुज भव पार न पावे कोई 

बातो की, बाती दिया से, तम निवृत्त नहीं होई ।।

सूरदास तुलसी भी कह गये, कह गये संत अनेक 

सुनो गुणों सब सत्य की बाते, पथ यथार्थ ही नेक ।।60॥

 

सांख्ययोंग, सन्यास योंग  में, कर्मयोग का संग 

कुछ ना कुछ तो अवश्य रहेगा, कुछ संग्रह का ढंग ।।

हृदय परम त्यागी सन्यासी, तब कर्तव्य करेगा 

कर्मयोग में कर्म त्याग का, तब भवतव्य बनेगा ।।61॥

 

सब कर्मो में बना अकर्मी, फल कर्मो का त्याग 

ध्यानोपासन साधन करके, ही समत्व तब जागे ।।

ऐसे मुनि को मोक्ष मिलेगा, होता नही विलम्ब 

मन तन वचन अलिप्त बनेगा, तत्व ज्ञान अवलम्ब ।।62॥

 

जैसे जल कमल रहे, जग पाप नही लगता है 

आत्म शुद्धि हित साधन कर, ब्रह्मार्पणं कर देता है ।।

समतावान  कर्मफल त्यागी, परम शान्ति है पाता 

और अयोगी बंधन में रह, मुक्त नही हो पाता ।। 63॥

 

नौ छिद्रों की तन नगरी में, संयम करे अकर्मी 

रहे कर्मरत, राग न फल में, कर्मयोग का धर्मी ।।

आत्मज्ञान में पूर्ण बने, वह महा ब्रम्ह सुख भोगी 

मन को वश कर, इन्द्रिय सुख से ऊपर उठता योगी ।। 64

 

इन्द्रिय सुख के बाह्य - भोग में, लिप्त बने क्यों योगी 

परमानन्द परम सुख पाकर, पावे क्यों सुख - रोगी ।।

केवल बुद्धि शक्ति से यह, निर्लिप्त दशा नहि सम्भव 

पूर्ण रूप अज्ञान नष्ट हो, आत्मज्ञान से सम्भव ।।65॥

 

आत्मतेज के सूर्यज्ञान से, प्रभु दर्शन होता है 

आत्मा से ही परमात्मा का, ज्ञान सुलभ होता है ।।

ऐसे प्रभु का दर्शन कर, सब पाप नष्ट हो जाते 

तन्मय हो परमात्म परायण, मुक्त दशा को पाते ।।66॥

 

समदर्शी वह बन जाता है जग, जग के व्यवहार ।

उंच नीच सबमें समता पा, विजय करे संसार ॥

उसका जीवन निष्कलंक ब्रह्ममय, ब्रह्म में ही लीन ।

या अक्षय आनन्द, जगत् में कभी बने मलीन ।। 67 ।।

 

विषयों की आसक्ति न कराये, सुख दुःख का संसार ।

अन्तर में ही पा जाता है, विपुल ज्ञान भण्डार ॥

आदि अन्त है विषय भोग का, चतुर नहीं रत होता।

पाता है निर्वाण ब्रह्म, वह जीवित मुक्त हो जाता ॥ 68॥

सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह।

यम के पाँच अंग है ये, बतलाते योगी साग्रह ॥

शौच और सन्तोष तपस्या ईश-भक्ति स्वाध्याय ।

ये हैं पाँच नियम कहलोत विज्ञ सभी बतलाये ॥ 69॥

 

यम अरु नियम का पालन हो, और विषय भोग से भागे।

भौहौं मध्य दृष्टि कर, स्थिर प्राणवायू को साधें।।

प्राणायाम को गति सम करके, इंद्रिय मन बुद्धि वश हो।

 ईच्छा अरु भय क्रोध रहित हो, साधन हो सर्वश हो ।।70॥

 

ऐसा मननशील मुनि हरदम, मुक्त बना रहता है।

रहता यज्ञ तपस्या भोगी, सबका हित करता है।।

 सब लोकों में महाप्रभु - परमात्म, की कर पहचान।

परम शान्ति को प्राप्त कर, वह योगी विज्ञ महान् ॥ 71॥

 

कतिपय साधक पूरक - कुंभक के साधन को साधें।

प्राण अपान वायु सम करने, ध्यान क्रिया को साधें।

किन्तु निरापद नहीं क्रिया यह, क्यों खतरा ले मोल।

दृष्टि रखे मौहों के मध्य में दृष्टियोग अनमोल ॥ 72॥

 

इससे भी निरुद्ध होता है , प्राणों का स्पन्दन ।

यही निरापद साधन है, अति सुलभ युक्ति सम्पादन ॥

युक्ति न जाने इसमें भी भी तो, नयन वक्र हो जाये ।

दृष्टि नहीं नयनों का गोला, बस सतर्क हो जाये ॥73॥

 

एक विन्दुता मन दृष्टि की, चित्त को वृति समेटे।

चेतन सुरत ऊर्ध्वगति होवे, अरु समत्व सब प्रगेट ।।

 स्थित प्रज्ञता, सांख्यज्ञान, और कर्मयोग हो पूर्ण ।

 आत्म दरश हो ब्रह्म दरश हो, अवलम्बित सम्पूर्ण ॥ 74॥

 

आकर्षण का केन्द्र कृष्णा है, आकर्षण ही राधा।

आकर्षण है परम ब्रह्म में, जीव है राधा आधा। ॥

आधा जब मिल जाय पूर्ण से, खत्म हुई सबब बाधा।

पारस ब्रह्म दरश परसन से बने न सोना आथा ॥ 75॥

हुआ समाप्त पंचम अध्याय।
प्रभुवर हरदम रहे सहाय।।
गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।

 

 







4



स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि

श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, सरस और काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत कर आध्यात्मिक साहित्य को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की। उनकी लेखनी का उद्देश्य गीता के गहन सिद्धांतों को प्रत्येक पाठक के लिए सहज, प्रेरणादायक और जीवनोपयोगी बनाना था। यह कृति धर्म, कर्म, भक्ति, आत्मज्ञान और मानव जीवन के उच्च आदर्शों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है तथा पाठकों को आत्मोन्नति और ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है। उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।

ध्यान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 6 - (हिन्दी पदानुवाद)


अध्याय - 6

ध्यान योग श्री गीता योग प्रकाश का छठा अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण मन के संयम, ध्यान साधना, योगाभ्यास तथा आत्मानुभूति का मार्ग बताते हैं। इस अध्याय में योगी के आदर्श जीवन, ध्यान की विधि, चंचल मन को नियंत्रित करने के उपाय तथा योगभ्रष्ट की गति का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि नियमित अभ्यास, वैराग्य और ईश्वर-समर्पण से मन को स्थिर कर परम शांति एवं आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किया जा सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 6 (ध्यान योग) का हिन्दी पदानुवाद, सरल भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता प्रस्तुत की गई है।

ध्यान योग

प्रथम योग अर्जुन विषाद का, द्वितीय सांख्य का योग

अमर आत्मा है नश्वरतन में, यही सांख्य का योग

आत्म ज्ञान करके बुद्धि जब, स्थिरता है पाती।

द्वंद द्वैत मिट जाते है सब, समत्वता हैं आती 76


सब दुःखों का नाश होय, जब प्राप्त ब्रह्म निर्वाण

बुद्धि स्थिर होती समाधि में, यहीं शास्त्र परमाण  

आत्मज्ञान पूरन समाधि में, स्थितप्रज्ञ तब ही हो।

ऐसे साधक समाधि को ही, ईश्वर भी परिचित हो॥77

ज्ञानविज्ञान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 7

ज्ञानविज्ञान योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 7

ज्ञानविज्ञान योग श्री गीता योग प्रकाश का सातवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (अनुभूत ज्ञान) के वास्तविक स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस अध्याय में वे अपनी अपरा और परा प्रकृति, समस्त सृष्टि के मूल कारण, माया की शक्ति तथा अनन्य भक्ति के महत्व को स्पष्ट करते हैं। भगवान बताते हैं कि उन्हें तत्त्व से जानना केवल बौद्धिक ज्ञान से नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव से संभव है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 7 (ज्ञानविज्ञान योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।

ज्ञान विज्ञान-योग


परमात्मा हैं नित्य और अविनाशी मायातीत।

पृथ्वी बायु अग्नि जल नभ, मन बुद्धि अहं पर‌तीति ॥

अपरा प्र‌कृति कहाती उनकी,परा प्रकृति है चेतन ।

इन दोनों से पैदा होते, सब प्राणी जड़ चेतन ॥136॥


सभी सृष्टि उत्पन्न व लय हो, परम प्रभू के कारण ।

संरचना सब गुथी हुई है, उनसे सदा अकारण ॥

जल में रस भी परम प्रभू हैं, रवि चन्द्र अग्नि में तेज।

नभ में शब्द, पुरुष में पराक्रम, वेदहिं “ॐ” सतेज ॥137॥

अक्षरब्रह्म योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 8


अध्याय- 8

अक्षरब्रह्म योग श्री गीता योग प्रकाश का आठवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ तथा मृत्यु के समय ईश्वर-स्मरण के गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि जो साधक अंतिम समय में परमात्मा का स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। साथ ही जीवनभर ईश्वर-चिंतन, निष्काम कर्म और अटूट भक्ति के महत्व को भी स्पष्ट किया गया है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 8 (अक्षरब्रह्म योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।

अक्षर ब्रह्मयोग


तन के साथ अनाशी रहता, आत्मतत्व हर तन में।

उससे उच्च ब्रह्म परमाक्षर, बँधा नहीं जो तन में।

तन से बंधी शरिरी आत्मा, यह तो है अध्यात्म ।

सव यज्ञों के अधिपति हैं, सर्वत्र व्याप्त पर‌मात्म ॥153॥



प्राणों को उत्पन करे, व्यापार कर्म कहलाता ।

नाशवान् रूप इस जग में, है अधिभूत कहाता।

नाशवान तन का चेतन, अधिदैव पुरुष कहलाता ।

तन जो तेजे परम प्रभु सुमिरत, जा उनमें मिल जाता ॥154॥

राजविद्याराजगुह्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 9

राजविद्याराजगुह्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 9


राजविद्याराजगुह्य योग श्री गीता योग प्रकाश का नौवाँ अध्याय है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वोत्तम ज्ञान और परम रहस्य कहा गया है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति की महिमा, ईश्वर की सर्वव्यापकता, निष्काम कर्म तथा अनन्य श्रद्धा के महत्व का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सच्ची भक्ति, पूर्ण समर्पण और निष्कपट भाव से किया गया प्रत्येक कर्म साधक को परमात्मा के निकट ले जाता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 9 (राजविद्याराजगुह्य योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।

विभूति योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10

विभूति योग श्री गीता योग प्रकाश का दसवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों, ऐश्वर्य और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में वे बताते हैं कि संसार में जो भी श्रेष्ठ, तेजस्वी, पवित्र, बलवान, ज्ञानवान और अद्भुत है, वह उनकी दिव्य शक्ति का ही अंश है। विभूति योग का उद्देश्य साधक को प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक श्रेष्ठता में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव कराना तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति को दृढ़ करना है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 10 (विभूति योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।


विभूति योग

विभूतियों का वर्णन सुन्दर, करते प्रभुवर अपने।

करें नित्य अभ्यास योग तो, आती हैं सब अपने॥

यह तो अलौकिक शक्ति महा, प्रभुवर का है वरदान।

अष्ट सिद्धियां कहते इनको, आठ ही हीं परधान ॥221॥



आणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति और प्राकाम्य । 

और ईशित्व वशित्व कहावें, भक्त को हो नहिं काम्य ॥

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई, बुद्धिहिं लोभ दिखावहीं आई। 

होई बुद्धि जो परम सयानी, तिन्ह तन चितवन अनहित जानी ।।222॥

विश्वरूपदर्शन योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 11

विश्वरूपदर्शन योग  - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 11

विश्वरूपदर्शन योग श्री गीता योग प्रकाश का ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट विश्वरूप प्रदर्शित करते हैं। इस अध्याय में अर्जुन दिव्य चक्षुओं से भगवान के अनंत, सर्वव्यापी और कालस्वरूप का दर्शन करते हैं तथा अनुभव करते हैं कि समस्त सृष्टि, देवता, ऋषि, लोक और काल स्वयं श्रीकृष्ण में ही समाहित हैं। यह अध्याय ईश्वर की असीम शक्ति, विश्वव्यापी सत्ता और पूर्ण समर्पण के महत्व को स्पष्ट करता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 11 (विश्वरूपदर्शन योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवनोपयोगी संदेश सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।





स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि

श्री गीता योग प्रकाश के यशस्वी रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को सरल, भावपूर्ण और काव्यात्मक शैली में जनसामान्य तक पहुँचाने का अनुपम कार्य किया। उनकी लेखनी में आध्यात्मिक गहराई, साहित्यिक सौंदर्य और गीता के प्रति अटूट श्रद्धा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह कृति केवल गीता का काव्यात्मक प्रस्तुतीकरण नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, भक्ति, कर्म और धर्ममय जीवन का प्रेरक मार्गदर्शन है। उनकी यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। उनकी पावन स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।

भक्तियोग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 12

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 12


भक्तियोग श्री गीता योग प्रकाश का बारहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के स्वरूप, सच्चे भक्त के गुणों तथा ईश्वर-प्राप्ति के सरल मार्ग का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में सगुण और निर्गुण उपासना का विवेचन करते हुए बताया गया है कि निष्काम, अनन्य और समर्पित भक्ति मनुष्य को परमात्मा के निकट ले जाती है। साथ ही भगवान उन दिव्य गुणों का भी उल्लेख करते हैं जो एक आदर्श भक्त में होने चाहिए। प्रस्तुत लेख में अध्याय 12 (भक्तियोग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग श्री गीता योग प्रकाश का तेरहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के वास्तविक स्वरूप का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में प्रकृति और पुरुष, ज्ञान और ज्ञेय, आत्मा तथा परमात्मा के संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत और अविनाशी है। आत्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 13 (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।


गुणत्रयविभाग योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 14

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 14

गुणत्रयविभाग योग श्री गीता योग प्रकाश का चौदहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—का विस्तृत विवेचन करते हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि ये तीनों गुण किस प्रकार मनुष्य के स्वभाव, विचार, कर्म और जीवन को प्रभावित करते हैं तथा आत्मा को जन्म-मरण के बंधन में बाँधे रखते हैं। साथ ही श्रीकृष्ण गुणातीत अवस्था का मार्ग बताते हैं, जहाँ साधक तीनों गुणों से ऊपर उठकर परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 14 (गुणत्रयविभाग योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में इसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।

पुरुषोत्तम योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15

पुरुषोत्तम योग श्री गीता योग प्रकाश का पंद्रहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, जीवात्मा, परमात्मा तथा पुरुषोत्तम के दिव्य स्वरूप का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि संसार क्षणभंगुर है और परम पुरुषोत्तम भगवान की शरण ग्रहण करके ही मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त कर सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।

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