श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 16
दैवासुरसम्पद्विभाग योग श्री गीता योग प्रकाश का सोलहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के दैवी (श्रेष्ठ) और आसुरी (अधम) गुणों का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में निर्भयता, सत्य, दया, आत्मसंयम, क्षमा जैसे दैवी गुणों तथा अहंकार, क्रोध, लोभ, दंभ और हिंसा जैसे आसुरी स्वभावों का विस्तार से वर्णन किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि दैवी गुण मोक्ष की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्य के पतन का कारण बनती हैं। प्रस्तुत लेख में अध्याय 16 (दैवासुरसम्पद्विभाग योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के अमर संदेश को सरल, सरस और काव्यात्मक शैली में जन-जन तक पहुँचाने का प्रेरणादायी प्रयास किया। उनकी यह कृति केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, धर्म, कर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला आध्यात्मिक प्रकाश-स्तंभ है। गीता के गूढ़ सिद्धांतों को सहज भाषा में प्रस्तुत कर उन्होंने आध्यात्मिक साहित्य को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की। उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।



