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अर्जुन विषाद योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

 श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

अर्जुन विषाद योग श्री गीता योग प्रकाश का प्रथम अध्याय है, जो श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अपने ही स्वजनों, गुरुजनों और संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन मोह, करुणा और विषाद से व्याकुल हो उठते हैं। यही मानसिक द्वंद्व भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का कारण बनता है। यह अध्याय मानव जीवन में उत्पन्न होने वाले नैतिक संघर्ष, कर्तव्य और भावनाओं के टकराव का सजीव चित्रण करता है तथा आत्मज्ञान की यात्रा का प्रथम चरण माना जाता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, काव्यात्मक पदानुवाद, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवनोपयोगी संदेश सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

  अर्जुन विषाद योग

बहुत दिनो की बात हुई यह बात है अमर कहानी ।

पांच हजार बरस बीते है, फिर भी नहीं पुरानी ।।

लिया जन्म भगवान कृष्ण ने, धन्य हुई यह धरनी ।

युद्ध किया कौरव पाण्डव ने, कथा विषय यह वरनी ।। 1॥

 

युद्ध भूमी में , पाण्डव दल में, अर्जुन के कोचवान ।

सारथि र्धम निभाया प्रभु  ने, धन्य धन्य भगवान ।।

दुर्योधन थे कौरव दल मेंमहाबली गुणवान ।

वृद्ध पिता धृतराष्ट्र थे उनके, स्वामी सहज सुजान ।। 2॥

 

नहीं जा सके युद्ध भूमी में, नयन बिना लाचार ।

समाचार संजय से सुनते, और युद्ध संचार ।।

युद्ध हुआ होने के तत्पर, अर्जुन करे विचार ।

उभय पक्ष के बीच खडे़ हो, प्रभु से किया गोहार।।3॥

 

 देखूँ तो है, कौन कौन, परिचित भाई गुरु चाचा ।

कैसा युद्ध बना है अपना, जस संजय ने बॅांचा ।।

जब भगवान ने किया खड़ा रथ, बीच सैन्य दल लाकर ।

बहुत विषाद हुआ अर्जुन को, अपने ही जन पाकर ।।4॥

 

ममताग्रस्त दयार्द्र हुए, अर्जुन को, शोक महान ।

तब जो कुछ कहा प्रभु ने, वह गीता का ज्ञान ।।

यह तो रहा विषाद योग, अर्जुन का प्रथम पुनीत ।

कृष्णार्जुन संवाद रुप में , है गीता का गीत ।।5॥

 

हुआ समाप्त प्रथम अध्याय

प्रभुवर हरदम रहे सहाय ।।

गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।




स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि

श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संदेश को सरल, भावपूर्ण और काव्यात्मक हिन्दी में प्रस्तुत कर आध्यात्मिक साहित्य को समृद्ध किया। उनका उद्देश्य गीता के गूढ़ दार्शनिक ज्ञान को प्रत्येक पाठक तक सहज रूप में पहुँचाना था, ताकि जीवन के संघर्षों में भी धर्म, कर्तव्य, आत्मविश्वास और ईश्वर-भक्ति का मार्ग स्पष्ट हो सके। उनकी यह अनुपम कृति भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, साहित्यिक साधना और गीता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा की अमर धरोहर है। उनकी पावन स्मृति को शत-शत नमन।

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