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सांख्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

सांख्य योग श्री गीता योग प्रकाश का दूसरा अध्याय है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता का दार्शनिक आधार माना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, कर्तव्यपालन, समत्व, बुद्धियोग और निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं। यही अध्याय आगे आने वाले सभी अध्यायों की मूल आधारशिला भी है। भगवान बताते हैं कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव रखते हुए अपने स्वधर्म का पालन करना ही सच्चा योग है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 2 (सांख्य योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।


सांख्य योग



युद्ध क्षेत्र में खडे़ हुये हो, यह तो समय विषम है ।

मोह कहॉं से आया अर्जुन, अपयशदायक मन है ।।

पण्डित ज्ञानी सम तव वाणी, मोह न मन में लाओ ।

यह न शोक का समय, करो कर्त्तव्य, वहीं बस ध्यावो ।। 6

 

सब थे पहले, फिर भी होंगे, चलता चक्र पुराना ।

जो भी जन्म लिया मरता है, नया ही बने पुराना ।।

इस तन में है आत्मा, अमर और अविनाशी ।

बसन बदलना होता रहता, क्या मगहर क्या काशी ।।7

 

जो है निश्चित, शोक न करना, सत्य सदा अविनाशी ।

धर्म युद्ध में युद्ध करो हे, कीर्ति मिले अविनाशी ।।

मृत्यु -मिलन का शोक न करना, स्वर्ग मिलेगा तत्क्षण ।

कष्ट अगर इन्द्रिन को होगा, सहते जाना हर क्षण ।।8

 

दुःख सुख में मन को सम रखना, हे मेरे वरवीर ।

ये तो नित्य नही रहते है, मत आतुर हो धीर ।।

समता में रहने वाले को, कभी न लगता पाप ।

सांख्य योग प्रारम्भ हुआ तो, नाश न हो परताप ।।9

 

इसका पालन निशिदिन करना, कर्म का बन्धन काटे ।

निर्भय सदा बना रहता है, सत्य के हाटे बाटे ।।

कर्म नहीं कोई बल रखता, इस समता के आगे ।

निश्चल मन जब हो समाधि में, स्थितप्रज्ञता जागे ।।10

 

स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण है, हे  प्रभुवर बतलाये।

काम-रहित, निज आत्म पथिक, अति तुष्ट प्रभु बतलाये ।।

जो सुख दुःख में समचित रहता, मन विकार नहिं जागे ।

जो परहित में आगे रहता, अरु प्रपन्च से भागे ।।11

 

आसक्ति हो विषय के चिन्तन, आसक्ति से काम ।

काम क्रोध की जननी बनता, मूर्खता परिणाम ।।

मूढ़ बने तो चेत भी भागे,  ज्ञान का होवे नाश ।

मृतक समान बने नर उस क्षण, ज्ञान का हो जब नाश ।।12

 

ज्ञान नहीं तो भक्ति भी भागे, भागे तुरत विवके ।

भक्ति बिना नहिं शांति मिले, यह परम सलोना टेक ।।

शांति बिना सुख सपनेहु दुष्तर,  बोले सन्त अनेक ।

योगी जागे, जब जग सोवे, यही एक पथ नेक ।।13

 

ब्राह्मी-दशा प्राप्त नर ऐसा, परम शांति को पाता ।

पाकर परम प्रभु पथ पावन, मोह मार्ग नहिं जाता ।।

अन्त काल में भी समता रख, ब्रह्मलीन हो जाता ।

मुक्त हुआ जीवन बन्धन से, वही मोक्ष है पाता ।।14॥

 

 

प्रथम श्रवण, फिर मनन करो हे, सांख्य ज्ञान के खातिर ।

आत्म ज्ञान पा, लिप्त न हो मन, जगत मोह के खतिर ।।

यही दशा जीवित मुक्ति की, जीवित ही पा जाना ।

कर्म सभी जग का करना हे, प्रभु संग प्रीति निभाना ।।15

हुआ समाप्त द्वितय अध्याय ।

प्रभुवर हरदम रहे सहाय ।।

गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।





स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के माध्यम से स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, भावपूर्ण और जनसुलभ
रूप में प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी केवल काव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम थी। यह कृति उनके ज्ञान, श्रद्धा और मानव कल्याण के प्रति समर्पण की अमूल्य धरोहर है। आज भी उनकी रचनाएँ पाठकों को कर्म, भक्ति, त्याग और आत्मबोध के पथ पर प्रेरित करती हैं। उनकी पावन स्मृति को शत-शत नमन।

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