अध्याय- 8
अक्षर ब्रह्मयोग
तन के साथ अनाशी रहता, आत्मतत्व हर तन में।
उससे उच्च ब्रह्म परमाक्षर, बँधा नहीं जो तन में।
तन से बंधी शरिरी आत्मा, यह तो है अध्यात्म ।
सव यज्ञों के अधिपति हैं, सर्वत्र व्याप्त परमात्म ॥153॥
प्राणों को उत्पन करे, व्यापार कर्म कहलाता ।
नाशवान् रूप इस जग में, है अधिभूत कहाता।
नाशवान तन का चेतन, अधिदैव पुरुष कहलाता ।
तन जो तेजे परम प्रभु सुमिरत, जा उनमें मिल जाता ॥154॥