श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10
विभूति योग श्री गीता योग प्रकाश का दसवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों, ऐश्वर्य और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करते हैं। इस अध्याय में वे बताते हैं कि संसार में जो भी श्रेष्ठ, तेजस्वी, पवित्र, बलवान, ज्ञानवान और अद्भुत है, वह उनकी दिव्य शक्ति का ही अंश है। विभूति योग का उद्देश्य साधक को प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक श्रेष्ठता में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव कराना तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति को दृढ़ करना है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 10 (विभूति योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।
विभूति योग
विभूतियों का वर्णन सुन्दर, करते प्रभुवर अपने।
करें नित्य अभ्यास योग तो, आती हैं सब अपने॥
यह तो अलौकिक शक्ति महा, प्रभुवर का है वरदान।
अष्ट सिद्धियां कहते इनको, आठ ही हीं परधान ॥221॥
आणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति और प्राकाम्य ।
और ईशित्व वशित्व कहावें, भक्त को हो नहिं काम्य ॥
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई, बुद्धिहिं लोभ दिखावहीं आई।
होई बुद्धि जो परम सयानी, तिन्ह तन चितवन अनहित जानी ।।222॥