अध्याय - 6
ध्यान योग श्री गीता योग प्रकाश का छठा अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण मन के संयम, ध्यान साधना, योगाभ्यास तथा आत्मानुभूति का मार्ग बताते हैं। इस अध्याय में योगी के आदर्श जीवन, ध्यान की विधि, चंचल मन को नियंत्रित करने के उपाय तथा योगभ्रष्ट की गति का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि नियमित अभ्यास, वैराग्य और ईश्वर-समर्पण से मन को स्थिर कर परम शांति एवं आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किया जा सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 6 (ध्यान योग) का हिन्दी पदानुवाद, सरल भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता प्रस्तुत की गई है।
ध्यान योग
प्रथम योग अर्जुन विषाद का, द्वितीय सांख्य का योग ।
अमर आत्मा है नश्वरतन में,
यही सांख्य का योग ॥
आत्म ज्ञान करके बुद्धि जब,
स्थिरता है पाती।
द्वंद द्वैत मिट जाते है सब, समत्वता हैं आती ॥ 76 ॥
सब दुःखों का नाश होय,
जब प्राप्त ब्रह्म निर्वाण ।
बुद्धि स्थिर होती समाधि में, यहीं शास्त्र परमाण ॥
आत्मज्ञान पूरन समाधि में, स्थितप्रज्ञ तब ही हो।
ऐसे साधक समाधि को ही, ईश्वर भी परिचित हो॥77॥