Religious Woarld Smart Search


Sort :
Loading...
Go to Page :

Search This Blog

कर्म - योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3
कर्म - योग 

कर्म योग श्री गीता योग प्रकाश का तीसरा अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण निष्काम कर्म, कर्तव्य पालन और लोकसंग्रह के सिद्धांत का गहन उपदेश देते हैं। इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य कर्म किए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, इसलिए उसे फल की आसक्ति त्यागकर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि निष्काम कर्म ही आत्मशुद्धि, समाज-कल्याण और अंततः मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 3 (कर्म योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।

कर्म बिना नर कभी न रहता, नर का यही स्वभाव 

राग - व्देष संग में रहने से, सुख क सदा अभाव ।।

जो कर्तव्य मात्र करता है, लोभ लाभ को तजकर ।

उसका लाभ अनंत गुणा है, रक्षक प्रभु को मजकर ।।16॥

 

बिना लोभ उपयुक्त कर्म से, सदा मोक्ष अधिकारी ।

यही कर्म है कर्म - योग, जिसकी महिमा अति भारी ।।

चंचल गति वाला मन भागे, तू मत जाय शरीर ।

धीरे - धीरे मन को साधो, प्रभु हरेगे पीर ।।17॥

 

जो जग का सब कर्म तजोगे, पर हितार्थ सब कर्म ।

बिना कर्म बैठे रहना भी, है भारी दुष्कर्म ।।

जनक, कृष्ण, अवतार सभी, सब संतो को भी देखा ।

सबने कर्म निभाया अपना, रख आदर्श अनोखा ।।18॥

 

कर्मेन्द्रिय से कर्म करे, संयमित रहे मन वशकर ।

क्या यह सुगम महा है, इस माया प्रपंच में फंसकर ।।

क्या यह सुख - साम्राज्य मिलेगा, बस मन को समझाये ।

नही नही यहाँ अगम राह है, सुगम सतगुरु पाये ।।19॥

 

सतगुरु जी बतलाते है, इस मन घोड़े का खूंटा ।

कैसे संध्या ध्यान बने, जिस बिन जग का सुख रूठा ।।

बिना भेंद पाये सतगुरु से, रहे मांग अनबूझा ।

कहाँ शांति मिल पाई किसको, जो अनबूझे जूझा ।।20॥

 

आत्मज्ञान का काम दहन का, कर्मयोग की सिध्दि।

क्या करिये अभ्यास अगर, अज्ञात रहे वह बुध्दि।।

करी त्रिकाल संध्या निज मन में, भक्ति ज्ञान पनपावे ।

आत्मज्ञान से ही मन वश हो, जो सतगुरु मिल जावे ।।21॥

 

इसमें ही कल्याण जगत का, इसके बिन जग सूना ।

यह मारग जो छोड़ दिया तो, दुःख सब नित - नित दूना ।।

इसके बिन परमार्थ न जागे, स्वास्थ्य जग सुख खाये।

ताम - झाम सब कुछ छूंछा है, सब भीतर अकुलावे ।।

 

हुआ समाप्त तृतीय अध्याय ।

प्रभुवर हरदम रहे सहाय ।।

गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।





स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि

श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, भावपूर्ण और काव्यात्मक शैली में जन-जन तक पहुँचाने का अनुपम कार्य किया। उनकी लेखनी गीता के गहन आध्यात्मिक सिद्धांतों को सहज, प्रेरक और जीवनोपयोगी रूप में प्रस्तुत करती है। यह कृति पाठकों को निष्काम कर्म, धर्म, भक्ति, आत्मज्ञान और ईश्वर-समर्पण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उनकी यह साहित्यिक एवं आध्यात्मिक धरोहर सदैव मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।

Translate