श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15
पुरुषोत्तम योग श्री गीता योग प्रकाश का पंद्रहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण संसार रूपी उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष, जीवात्मा, परमात्मा तथा पुरुषोत्तम के दिव्य स्वरूप का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि संसार क्षणभंगुर है और परम पुरुषोत्तम भगवान की शरण ग्रहण करके ही मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त कर सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा दैनिक जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को सरल, काव्यात्मक और जनसुलभ भाषा में प्रस्तुत कर आध्यात्मिक साहित्य को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की। उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल गीता का भावार्थ प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि प्रत्येक पाठक के जीवन में धर्म, कर्म, भक्ति और आत्मबोध की ज्योति प्रज्वलित करना था। उनकी यह कृति आज भी साधकों और पाठकों को सत्य एवं मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है। उनकी पावन स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।


