श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 17
श्रद्धात्रय विभाग योग श्री गीता योग प्रकाश का सत्रहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन स्वरूप—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक—का विस्तृत विवेचन करते हैं। इस अध्याय में श्रद्धा के अनुसार मनुष्य के आहार, यज्ञ, तप, दान और जीवन-व्यवहार का विश्लेषण किया गया है तथा यह बताया गया है कि जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही मनुष्य का व्यक्तित्व और जीवन बनता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन और व्यावहारिक जीवन में उसकी उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के माध्यम से स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, भावपूर्ण और जनसुलभ
रूप में प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी केवल काव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम थी। यह कृति उनके ज्ञान, श्रद्धा और मानव कल्याण के प्रति समर्पण की अमूल्य धरोहर है। आज भी उनकी रचनाएँ पाठकों को कर्म, भक्ति, त्याग और आत्मबोध के पथ पर प्रेरित करती हैं। उनकी पावन स्मृति को शत-शत नमन।


