विश्वरूपदर्शन योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 11
विश्वरूपदर्शन योग श्री गीता योग प्रकाश का ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट विश्वरूप प्रदर्शित करते हैं। इस अध्याय में अर्जुन दिव्य चक्षुओं से भगवान के अनंत, सर्वव्यापी और कालस्वरूप का दर्शन करते हैं तथा अनुभव करते हैं कि समस्त सृष्टि, देवता, ऋषि, लोक और काल स्वयं श्रीकृष्ण में ही समाहित हैं। यह अध्याय ईश्वर की असीम शक्ति, विश्वव्यापी सत्ता और पूर्ण समर्पण के महत्व को स्पष्ट करता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 11 (विश्वरूपदर्शन योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवनोपयोगी संदेश सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के यशस्वी रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को सरल, भावपूर्ण और काव्यात्मक शैली में जनसामान्य तक पहुँचाने का अनुपम कार्य किया। उनकी लेखनी में आध्यात्मिक गहराई, साहित्यिक सौंदर्य और गीता के प्रति अटूट श्रद्धा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह कृति केवल गीता का काव्यात्मक प्रस्तुतीकरण नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, भक्ति, कर्म और धर्ममय जीवन का प्रेरक मार्गदर्शन है। उनकी यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी। उनकी पावन स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।


