श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग श्री गीता योग प्रकाश का तेरहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के वास्तविक स्वरूप का गहन विवेचन करते हैं। इस अध्याय में प्रकृति और पुरुष, ज्ञान और ज्ञेय, आत्मा तथा परमात्मा के संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत और अविनाशी है। आत्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 13 (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश को सरल, सरस और काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत कर आध्यात्मिक साहित्य को समृद्ध किया। उनकी रचनाएँ केवल गीता का भावार्थ नहीं, बल्कि जीवन को धर्म, कर्म, भक्ति और आत्मबोध के मार्ग पर अग्रसर करने वाली प्रेरणा हैं। यह कृति उनके गहन आध्यात्मिक चिंतन, गीता के प्रति अटूट श्रद्धा और साहित्य-साधना की अमूल्य धरोहर है। उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।





