राजविद्याराजगुह्य योग - श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 9
राजविद्याराजगुह्य योग श्री गीता योग प्रकाश का नौवाँ अध्याय है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वोत्तम ज्ञान और परम रहस्य कहा गया है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति की महिमा, ईश्वर की सर्वव्यापकता, निष्काम कर्म तथा अनन्य श्रद्धा के महत्व का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सच्ची भक्ति, पूर्ण समर्पण और निष्कपट भाव से किया गया प्रत्येक कर्म साधक को परमात्मा के निकट ले जाता है। प्रस्तुत लेख में अध्याय 9 (राजविद्याराजगुह्य योग) का सरल हिन्दी भावार्थ, आध्यात्मिक विवेचन तथा जीवन में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता सहज और सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है।
स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय को श्रद्धांजलि
श्री गीता योग प्रकाश के रचयिता स्वर्गीय विजय शंकर पाण्डेय ने श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को सरल, काव्यात्मक और जनसुलभ भाषा में प्रस्तुत कर आध्यात्मिक साहित्य को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की। उनकी लेखनी में गीता के शाश्वत संदेश, भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्श और मानव जीवन के गहन सत्य सहज रूप में अभिव्यक्त होते हैं। यह कृति प्रत्येक पाठक को धर्म, कर्म, भक्ति और आत्मबोध के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उनकी पावन स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।








