ऐसी मूढ़ता क्यों, हे मन?
पूज्य महर्षि मेही परमहंस महाराज के शिष्य, पूज्य महर्षि संतसेवी परमहंस महाराज अपने प्रवचन में मनुष्य के मन की एक बड़ी विचित्र स्थिति को समझाते हैं।
मनुष्य जानता है कि संसार की वस्तुओं से मिलने वाला सुख स्थायी नहीं है। यह भी जानता है कि इच्छा पूरी होने के बाद कुछ समय तो अच्छा लगता है, लेकिन फिर मन किसी दूसरी चीज के पीछे दौड़ने लगता है। फिर भी मन रुकता नहीं।
वह बार-बार उसी रास्ते पर जाता है।
संतसेवीजी कहते हैं कि यही मन की सबसे बड़ी उलझन है।
हम जानते कुछ हैं और करते कुछ हैं।
हम जानते हैं कि क्रोध अच्छा नहीं है, फिर भी क्रोध आ जाता है। जानते हैं कि लोभ मन को अशांत करता है, फिर भी लोभ छोड़ना कठिन लगता है। जानते हैं कि विषयों के पीछे भागने से मन को स्थायी शांति नहीं मिलेगी, फिर भी मन बार-बार उन्हीं विषयों की ओर आकर्षित होता है।