जातिवाद पर एक प्रेरणादायक कहानी
बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक विद्वान पंडित अपनी पत्नी के साथ रहता था। पंडित धार्मिक अनुष्ठानों और शास्त्रों का बड़ा ज्ञाता माना जाता था, लेकिन उसके मन में ऊँच-नीच और छुआछूत की भावना गहराई तक बैठी हुई थी।
एक दिन दोपहर के समय पंडित को बहुत तेज़ प्यास लगी। उसने अपनी पत्नी से पानी माँगा।
पत्नी ने संकोच से कहा,
"घर में पानी समाप्त हो गया था, इसलिए मैं पड़ोस से पानी ले आई हूँ।"
पंडित ने पानी पिया और बोला,
"पानी बहुत ठंडा और मीठा है। कहाँ से लाई हो?"
पत्नी ने सहजता से उत्तर दिया,
"पड़ोस में रहने वाले कुम्हार के घर से।"
यह सुनते ही पंडित का चेहरा बदल गया। उसने हाथ का लोटा दूर फेंक दिया और क्रोध में बोला,
"तुमने मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया! शूद्र के घर का पानी मुझे पिला दिया!"
पत्नी घबरा गई। उसने हाथ जोड़कर कहा,
"मुझसे भूल हो गई। आगे से ऐसा नहीं होगा।"
पंडित का क्रोध कुछ समय बाद शांत हो गया।
शाम को पंडित भोजन करने बैठा।
उसने देखा कि थाली खाली है।
वह बोला,
"रोटी कहाँ है? सब्ज़ी क्यों नहीं बनाई?"
पत्नी मुस्कराकर बोली,
"बनाई तो थी, लेकिन जिस किसान ने अनाज उगाया था, वह आपकी दृष्टि में नीची जाति का था। और जिस लोहे की कड़ाही में भोजन बनाया था, उसे लोहार ने बनाया था। इसलिए मैंने सब फेंक दिया।"
पंडित झुंझलाकर बोला,
"अरे, अनाज और बर्तनों में भी कोई छुआछूत होती है क्या?"
पत्नी शांत रही।
कुछ देर बाद पंडित बोला,
"अच्छा, कम से कम पानी ही ले आओ।"
पत्नी ने उत्तर दिया,
"पानी तो है ही नहीं।"
"घड़े कहाँ गए?"
पत्नी बोली,
"मैंने उन्हें भी फेंक दिया, क्योंकि वे कुम्हार के हाथों से बने थे।"
पंडित हैरान रह गया।
पंडित ने कहा,
"ठीक है, दूध ही ले आओ।"
पत्नी बोली,
"वह भी फेंक दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि गाय का दूध जिस व्यक्ति ने दुहा था, वह भी आपकी दृष्टि में नीची जाति का था।"
पंडित अब असहज हो गया।
वह बोला,
"दूध में छुआछूत नहीं लगती।"
पत्नी ने तुरंत पूछा,
"ऐसी कैसी छुआछूत है जो पानी में तो लग जाती है, लेकिन दूध में नहीं?"
पंडित के पास कोई उत्तर नहीं था।
थोड़ी देर बाद पंडित ने कहा,
"जाओ, आँगन में खाट बिछा दो।"
पत्नी ने उत्तर दिया,
"खाट तो मैंने तोड़ दी, क्योंकि उसे बढ़ई ने बनाया था।"
अब पंडित का धैर्य टूटने लगा।
क्रोध में उसने कहा,
"भगवान को फूलों की माला चढ़ाऊँगा। जल्दी लाओ।"
पत्नी बोली,
"माला भी फेंक दी। उसे माली ने बनाया था।"
अब पंडित बिल्कुल निरुत्तर हो चुका था।
गुस्से में उसने कहा,
"क्या घर में कुछ बचा भी है?"
पत्नी ने शांत स्वर में उत्तर दिया,
"बस यह घर बचा है। इसे भी तोड़ना बाकी है, क्योंकि इसे बनाने वाले मजदूर, राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार और कुम्हार—सभी अलग-अलग समाजों से थे।"
यह सुनते ही पंडित की आँखें झुक गईं।
उसे पहली बार समझ में आया कि जिस समाज को वह छोटा समझता था, उसी समाज के परिश्रम से उसका पूरा जीवन चल रहा था।
उस दिन उसके भीतर की सोच बदलने लगी।
कहानी से शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम और कर्म से समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
यदि किसान खेती न करे, कुम्हार बर्तन न बनाए, लोहार औज़ार न बनाए, बढ़ई फर्नीचर न बनाए, मजदूर घर न बनाए और माली फूल न उगाए, तो किसी का भी जीवन सहज नहीं रह सकता।
इसलिए किसी व्यक्ति का सम्मान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र, ईमानदारी और मानवता से होना चाहिए।
सच्चा धर्म वही है जो मनुष्यों के बीच प्रेम, समानता, करुणा और सम्मान का भाव उत्पन्न करे।
जाति नहीं, कर्म महान होता है।
भेदभाव नहीं, समानता ही एक सभ्य समाज की पहचान है।
आइए, हम सभी एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें जहाँ हर व्यक्ति को सम्मान मिले और मानवता सबसे बड़ा धर्म बने।
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