1. देवताओं और असुरों के बीच सौ वर्षों का युद्ध
महर्षि मेधा ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य को देवी की महिमा का अगला प्रसंग सुनाते हुए बताया कि प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच सौ वर्षों तक भयंकर युद्ध हुआ था। उस समय असुरों का राजा महिषासुर था और देवताओं का नेतृत्व इन्द्र कर रहे थे।
युद्ध में महिषासुर की विशाल और शक्तिशाली सेना ने देवताओं को पराजित कर दिया। विजय प्राप्त करने के बाद महिषासुर ने इन्द्र का पद अपने अधिकार में कर लिया और स्वर्ग पर शासन करने लगा।
उसने केवल इन्द्र का अधिकार ही नहीं छीना, बल्कि सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम और वरुण सहित दूसरे देवताओं के अधिकारों पर भी कब्जा कर लिया। देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया गया और वे पृथ्वी पर भटकने के लिए विवश हो गए।
महिषासुर ने दैवी व्यवस्था को अपने नियंत्रण में कर लिया था। देवताओं के सामने अब अपनी शक्ति के बल पर उसे पराजित करने का कोई सरल उपाय नहीं बचा था।
2. देवताओं ने भगवान विष्णु और भगवान शिव से सहायता माँगी
पराजित देवता ब्रह्माजी को आगे करके भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुँचे। उन्होंने विस्तार से बताया कि महिषासुर ने किस प्रकार देवताओं को पराजित करके उनके पद और अधिकार छीन लिए हैं।
देवताओं ने प्रार्थना की कि महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है और दैवी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है। वे स्वयं उसे पराजित करने में असमर्थ रहे हैं। अब वे भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में आए हैं। उन्हें इस संकट से मुक्ति दिलाने का उपाय बताया जाए।
देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए। उनके क्रोध से उनके मुखमंडल पर तेज प्रकट होने लगा। ब्रह्माजी और अन्य देवताओं के शरीर से भी प्रचंड तेज निकलने लगा।
यह तेज केवल भगवान विष्णु और शिव तक सीमित नहीं था। इन्द्र तथा अन्य देवताओं के शरीर से भी दिव्य प्रकाश और ऊर्जा प्रकट होने लगी।
3. सभी देवताओं के तेज से देवी का प्राकट्य
भगवान विष्णु, भगवान शिव, ब्रह्माजी और अन्य देवताओं के शरीर से निकला तेज एक स्थान पर एकत्र होने लगा। वह तेज इतना प्रचंड था कि एक अग्निमय पर्वत के समान दिखाई देने लगा। उसकी ज्योति सभी दिशाओं में फैल गई।
धीरे-धीरे उस संयुक्त तेज ने एक दिव्य नारी का स्वरूप धारण कर लिया। देवी का प्रकाश तीनों लोकों में फैलने लगा।
दुर्गा सप्तशती के इस वर्णन में देवी के शरीर के विभिन्न अंगों की उत्पत्ति अलग-अलग देवताओं के तेज से बताई गई है। भगवान शिव के तेज से देवी का मुख, यम के तेज से उनके केश और भगवान विष्णु के तेज से उनकी भुजाएँ प्रकट हुईं।
चन्द्रमा के तेज से उनके स्तनों का, इन्द्र के तेज से मध्य भाग का, वरुण के तेज से जंघाओं और पिंडलियों का तथा पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग का प्रादुर्भाव हुआ।
ब्रह्माजी के तेज से उनके चरण, सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियाँ, वसुओं के तेज से हाथों की अंगुलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई। प्रजापति के तेज से दाँत और अग्नि के तेज से देवी के तीन नेत्र उत्पन्न हुए। संध्या के तेज से भौंहें तथा वायु के तेज से कान प्रकट हुए।
इस प्रकार सभी देवताओं के तेज से देवी का दिव्य स्वरूप पूर्ण हुआ। उन्हें देखकर महिषासुर से पीड़ित देवताओं के मन में आशा जागी।
4. देवताओं ने देवी को अस्त्र-शस्त्र और आभूषण अर्पित किए
देवी के प्राकट्य के बाद देवताओं ने उन्हें अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र और अन्य उपहार अर्पित किए।
भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल उत्पन्न करके देवी को दिया। भगवान विष्णु ने अपने चक्र से चक्र प्रदान किया। वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति और वायु ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकस अर्पित किए।
इन्द्र ने वज्र और अपने ऐरावत हाथी से एक घंटा प्रदान किया। यमराज ने दण्ड दिया, वरुण ने पाश और ब्रह्माजी ने कमण्डलु तथा स्फटिक की माला दी। सूर्य ने देवी के रोम-रोम में अपना तेज भर दिया और काल ने उन्हें तलवार तथा ढाल प्रदान की।
क्षीरसागर ने दिव्य हार, वस्त्र, आभूषण और अन्य रत्न अर्पित किए। विश्वकर्मा ने फरसा तथा अनेक अस्त्र-शस्त्र दिए। हिमालय ने देवी को सवारी के लिए सिंह और विभिन्न रत्न भेंट किए। कुबेर ने मधु से भरा पात्र दिया और शेषनाग ने बहुमूल्य मणियों से सुशोभित नागहार अर्पित किया।
अन्य देवताओं ने भी देवी को अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अस्त्र-शस्त्र और आभूषण दिए।
इस प्रकार देवी सभी देवताओं की शक्तियों और उनके दिव्य सामर्थ्य की संयुक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट हुईं।
5. देवी का सिंहनाद और असुरों में भय
अस्त्र-शस्त्र धारण करने के बाद देवी ने प्रचंड गर्जना की। उनके सिंहनाद से आकाश गूँज उठा। उसकी प्रतिध्वनि से समुद्रों में हलचल हुई, पृथ्वी काँप उठी और पर्वत हिलने लगे।
देवताओं ने देवी को देखकर जयकार की। उन्हें विश्वास हुआ कि अब महिषासुर के अत्याचार का अंत संभव है।
दूसरी ओर, देवी की गर्जना सुनकर असुरों में खलबली मच गई। महिषासुर की सेना ने अपने अस्त्र-शस्त्र सँभाले और युद्ध के लिए तैयार होने लगी।
महिषासुर ने भी क्रोध में आकर पूछा कि यह भयंकर आवाज कैसी है। वह अपने असुरों के साथ उस दिशा में दौड़ा जहाँ से गर्जना सुनाई दे रही थी।
जब उसने देवी को देखा, तो वह उनके दिव्य तेज से प्रकाशित स्वरूप और हजारों भुजाओं को देखकर युद्ध के लिए आगे बढ़ा।
देवी के चरणों के भार से पृथ्वी दबती हुई दिखाई देती थी। उनका मुकुट आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता था और उनके धनुष की टंकार से पाताल तक में हलचल मचने का वर्णन मिलता है।
इस प्रकार दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो गया।
6. महिषासुर के सेनापतियों का आक्रमण
महिषासुर ने अपनी विशाल सेना को देवी से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ाया। असुरों की सेना में अनेक शक्तिशाली सेनापति थे। प्रत्येक के साथ बड़ी संख्या में रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक थे।
चिक्षुर नाम का असुर महिषासुर की सेना का प्रमुख सेनापति था। उसने देवी के विरुद्ध युद्ध आरंभ किया। चामर नाम का असुर भी अपनी सेना के साथ युद्ध में उतरा।
उदग्र नाम का महादैत्य साठ हजार रथियों के साथ आया। महाहनु एक करोड़ रथियों के साथ युद्ध करने लगा। असिलोमा नाम का असुर पाँच करोड़ रथियों के साथ उपस्थित हुआ। बाष्कल नाम का दैत्य साठ लाख रथियों से घिरा हुआ था।
परिवारित नाम का असुर हाथियों, घोड़ों और रथियों के अनेक दलों के साथ आया। बिडाल नाम का असुर भी विशाल सेना लेकर युद्ध करने लगा।
इन सेनापतियों के अतिरिक्त हजारों दूसरे असुर भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर देवी पर आक्रमण करने लगे। महिषासुर स्वयं भी असंख्य रथों, हाथियों और घोड़ों से घिरी सेना के साथ युद्धभूमि में उपस्थित था।
असुरों ने देवी पर भाले, शक्ति, मूसल, तलवार, फरसे, पाश और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया।
7. देवी ने असुरों के अस्त्र-शस्त्र नष्ट कर दिए
असुरों की ओर से लगातार अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होने लगी। देवी ने भी अपने दिव्य अस्त्रों से उनका सामना किया। वे असुरों के प्रहारों को निष्फल करती रहीं और उनके अस्त्र-शस्त्रों को काटती गईं।
दुर्गा सप्तशती के वर्णन में देवी को युद्ध करते समय थकान से रहित और अडिग बताया गया है। उनके चेहरे पर परिश्रम का कोई चिह्न नहीं था।
देवी का सिंह भी युद्ध में सक्रिय हो गया। वह अपनी गर्दन के बाल हिलाता हुआ असुरों की सेना के बीच दौड़ता और अनेक असुरों को मार गिराता था। उसका आक्रमण वन में फैलती आग के समान बताया गया है।
इस बीच देवी अम्बिका ने युद्ध करते हुए जो निःश्वास छोड़े, उनसे सैकड़ों और हजारों गण उत्पन्न हुए। ये गण भी अस्त्र-शस्त्र लेकर असुरों से युद्ध करने लगे।
वे फरसे, तलवार, भाले और अन्य हथियारों से असुरों का सामना करते थे। साथ ही युद्ध के नगाड़े और शंख बजने लगे। देवी के गणों ने असुरों के विरुद्ध युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
8. असुरों की विशाल सेना का संहार
देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति, तलवार और अन्य अस्त्र-शस्त्रों से असंख्य असुरों का वध किया। देवी की घंटा की भयंकर ध्वनि से कई असुर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। अनेक असुरों को उन्होंने पाश से बाँधकर धरती पर गिरा दिया।
कई असुर तलवार के प्रहार से मारे गए, कुछ गदा की चोट से गिर पड़े और अनेक मूसल तथा शूल के प्रहार से घायल होकर नष्ट हो गए। देवी के बाणों से भी असुरों की बड़ी संख्या मारी गई।
युद्ध इतना भीषण हो गया कि असुरों के रथ, हाथी, घोड़े और सैनिकों के शव युद्धभूमि में बिखर गए। देवी के प्रहारों से असुरों की सेना में भारी विनाश हुआ।
देवी के गण भी लगातार युद्ध कर रहे थे। वे असुरों को मारते हुए युद्ध के वाद्य बजाते और गर्जना करते थे। देवता आकाश में इस युद्ध को देख रहे थे और देवी के पराक्रम से प्रसन्न होकर उन पर पुष्पवर्षा कर रहे थे।
अंततः देवी ने महिषासुर की विशाल सेना को उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे अग्नि सूखे घास और लकड़ी के बड़े ढेर को भस्म कर देती है।
देवी का सिंह भी गर्जना करता हुआ असुरों पर टूट पड़ता था। इस प्रकार महिषासुर की सेना का भारी संहार हुआ और देवताओं को विजय की आशा दिखाई देने लगी।
9. दूसरे अध्याय का समापन
दुर्गा सप्तशती का दूसरा अध्याय देवी के प्राकट्य और महिषासुर की सेना के संहार पर समाप्त होता है।
इस अध्याय में महिषासुर स्वयं अभी मारा नहीं जाता। उसकी सेना का बड़ा भाग नष्ट हो चुका है, लेकिन महिषासुर के साथ निर्णायक युद्ध आगे के तीसरे अध्याय में आता है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूसरे अध्याय का मुख्य विषय देवताओं के तेज से देवी का प्रकट होना और महिषासुर की सेना का वध है, जबकि तीसरे अध्याय में महिषासुर-वध की मुख्य कथा आती है।
व्याख्या : देवी का प्राकट्य और सामूहिक शक्ति का दर्शन
1. सभी देवताओं के तेज से देवी का प्रकट होना
इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग है—सभी देवताओं के तेज का एकत्र होकर देवी के रूप में प्रकट होना।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रसंग इस विचार की ओर संकेत करता है कि जब अनेक शक्तियाँ एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं, तब वे बड़ी चुनौती का सामना कर सकती हैं।
अलग-अलग देवताओं की शक्तियाँ देवी के स्वरूप में एकत्र होती हैं। प्रतीकात्मक रूप से इसे विभिन्न क्षमताओं, गुणों और सामर्थ्यों के समन्वय के रूप में समझा जा सकता है।
यह आधुनिक सामाजिक जीवन में भी प्रासंगिक विचार है। किसी बड़े संकट का समाधान अक्सर एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि अनेक लोगों के सहयोग, ज्ञान और सामूहिक जिम्मेदारी से संभव होता है।
2. महिषासुर का अत्याचार और अधिकारों का हरण
महिषासुर केवल युद्ध में विजयी होने पर संतुष्ट नहीं होता। वह देवताओं के अधिकार छीनकर स्वयं उनका अधिष्ठाता बन बैठता है। इस कारण देवताओं की व्यवस्था बाधित हो जाती है।
आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक दृष्टि से यह प्रसंग उस प्रवृत्ति की याद दिलाता है जिसमें शक्ति का उपयोग दूसरों के अधिकार छीनने के लिए किया जाता है।
शक्ति का महत्व केवल सामर्थ्य रखने में नहीं, बल्कि उसका उचित उपयोग करने में है। जब अधिकार और शक्ति अहंकार के अधीन हो जाते हैं, तब वे व्यवस्था और संतुलन को नष्ट कर सकते हैं।
3. देवी के अस्त्र-शस्त्रों का प्रतीकात्मक अर्थ
देवी को विभिन्न देवताओं से अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होते हैं। प्रतीकात्मक दृष्टि से इन्हें अलग-अलग क्षमताओं और गुणों के रूप में भी समझा जा सकता है।
त्रिशूल दृढ़ता और बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष का संकेत दे सकता है। चक्र सक्रियता और व्यवस्था की रक्षा की ओर ध्यान दिलाता है। धनुष-बाण लक्ष्य पर केंद्रित प्रयास का प्रतीक हो सकते हैं, जबकि घंटा सजगता और चेतावनी का संकेत दे सकती है।
ये अर्थ आध्यात्मिक चिंतन के लिए हैं; इन्हें मूल ग्रंथ द्वारा निर्धारित एकमात्र अर्थ नहीं मानना चाहिए।
4. देवी के गणों का प्रकट होना
कथा में देवी के निःश्वासों से अनेक गणों का उत्पन्न होना और युद्ध में उनका सहयोग करना विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इसे प्रतीकात्मक रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब किसी बड़े उद्देश्य के लिए नेतृत्व और संकल्प दृढ़ होते हैं, तो उनसे प्रेरित होकर अनेक सहयोगी भी सक्रिय हो जाते हैं।
केवल एक शक्तिशाली व्यक्ति पर निर्भर रहने के बजाय सामूहिक भागीदारी किसी भी चुनौती का सामना करने की क्षमता बढ़ा सकती है।
5. इस अध्याय से जीवन के लिए सीख
एकता में शक्ति है: अलग-अलग क्षमताओं का समन्वय बड़ी चुनौतियों का सामना करने में सहायक होता है।
शक्ति का उपयोग न्याय के लिए होना चाहिए: अधिकारों का हरण और दूसरों पर अत्याचार अंततः संघर्ष और असंतुलन को जन्म देते हैं।
साहस के साथ तैयारी भी आवश्यक है: देवी को अनेक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित दिखाया गया है। प्रतीकात्मक रूप से यह बताता है कि केवल इच्छा पर्याप्त नहीं, उचित साधन और तैयारी भी जरूरी हैं।
संकट में सहयोग स्वीकार करें: देवताओं ने अपनी पराजय स्वीकार करके सहायता माँगी। अपनी सीमा पहचानना कमजोरी नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
विजय के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है: देवी और उनके गण लगातार संघर्ष करते हैं। कथा धैर्य, संकल्प और सक्रियता का महत्व सामने लाती है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का दूसरा अध्याय देवी के प्राकट्य और महिषासुर की सेना के वध का वर्णन करता है। देवताओं के पराजित होने और उनके अधिकार छिन जाने के बाद उनकी संयुक्त शक्ति से देवी का दिव्य स्वरूप प्रकट होता है। देवी को प्राप्त अस्त्र-शस्त्र और उनका पराक्रम दैवी शक्ति की व्यापकता को सामने लाते हैं।
इस अध्याय का केंद्रीय संदेश है कि अन्याय और अत्याचार के सामने केवल शिकायत पर्याप्त नहीं होती। साहस, तैयारी, सहयोग और दृढ़ संकल्प के साथ उसका सामना करना आवश्यक है।
जब बिखरी हुई शक्तियाँ एक न्यायपूर्ण उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं, तब बड़े से बड़ा संकट भी चुनौती दिया जा सकता है।