1. चण्ड-मुण्ड ने देवी को देखा
धूम्रलोचन का वध हो चुका था। उसकी सेना भी देवी और उनके सिंह के सामने टिक नहीं सकी। जब यह समाचार शुम्भ तक पहुँचा, तो वह क्रोधित हो उठा। उसे विश्वास था कि उसकी विशाल सेना और शक्तिशाली सेनापति देवी को अवश्य पराजित कर देंगे, लेकिन एक के बाद एक उसके प्रयास विफल हो रहे थे।
इसी समय शुम्भ के दो प्रमुख सेनापति, चण्ड और मुण्ड, देवी के पास पहुँचे। उन्होंने देवी को हिमालय के एक भाग में विराजमान देखा। देवी का स्वरूप तेजस्वी था और उनका दिव्य सौंदर्य असाधारण दिखाई देता था।
चण्ड और मुण्ड ने देवी को देखकर अपने स्वामी शुम्भ के सामने उनका वर्णन किया था। अब वे देवी को अपने अधिकार में लेने के उद्देश्य से आगे बढ़े। शुम्भ की इच्छा थी कि देवी को किसी भी तरह उसके सामने लाया जाए।
2. देवी का उग्र स्वरूप प्रकट हुआ
चण्ड और मुण्ड की सेना देवी की ओर बढ़ी। असुरों के आक्रमण और उनके व्यवहार को देखकर देवी अम्बिका का मुख क्रोध से गंभीर हो उठा।
दुर्गा सप्तशती में वर्णन आता है कि देवी के क्रोध से उनका मुख काला पड़ गया और उनकी भौंहों से एक अत्यंत उग्र देवी प्रकट हुईं। उनका स्वरूप भयंकर था। वे खड्ग और पाश धारण किए हुए थीं। उनके हाथ में खट्वांग था, वे व्याघ्रचर्म धारण करती थीं और उनका रूप भय उत्पन्न करने वाला था।
उनका मुख विशाल था, आँखें गहरी थीं और वे भयंकर गर्जना कर रही थीं। वे असुरों की सेना पर टूट पड़ीं।
यह देवी काली का उग्र स्वरूप था, जो आगे चलकर चण्ड-मुण्ड के वध के कारण चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध हुआ।
3. काली ने असुरों की सेना पर आक्रमण किया
काली ने असुरों की सेना पर अचानक आक्रमण कर दिया। वे युद्धभूमि में अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ीं और असुर सैनिकों का संहार करने लगीं।
वे अनेक सैनिकों को पकड़कर मार देती थीं, कुछ को अपने मुख में डाल लेती थीं और कई असुरों को अपने अस्त्रों से काट गिराती थीं। उनके उग्र रूप और प्रचंड आक्रमण से असुरों की सेना में भय फैल गया।
उनके हाथों में खड्ग और पाश थे। वे शत्रुओं को पकड़तीं, गिरातीं और उनका अंत करती जाती थीं। देवी के इस प्रचंड रूप के सामने असुरों की पंक्तियाँ टूटने लगीं।
चण्ड और मुण्ड ने अपनी सेना को सँभालने और देवी को रोकने का प्रयास किया। उन्होंने भीषण युद्ध आरंभ कर दिया।
4. चण्ड का वध
चण्ड ने देवी पर अनेक अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया। असुरों की ओर से बाणों और अन्य हथियारों की वर्षा होने लगी।
काली ने उनके प्रहारों का सामना किया। वे असुरों के अस्त्र-शस्त्रों से विचलित नहीं हुईं और लगातार आगे बढ़ती रहीं।
अंततः काली ने चण्ड पर प्रहार किया और उसका मस्तक काट दिया। चण्ड के मारे जाने से असुरों की सेना को भारी आघात पहुँचा।
जिस सेनापति को शुम्भ ने देवी को पराजित करने के लिए भेजा था, वह स्वयं देवी के उग्र स्वरूप के सामने टिक नहीं सका।
5. मुण्ड का वध
चण्ड के मारे जाने के बाद मुण्ड ने भी देवी पर आक्रमण किया। वह अपने साथी सेनापति की मृत्यु से विचलित हुए बिना युद्ध करने लगा।
काली ने उसका भी सामना किया। उनके प्रहार से मुण्ड पराजित हुआ और उसका मस्तक काट दिया गया।
इस प्रकार चण्ड और मुण्ड दोनों का अंत हो गया। असुरों की सेना में भय और अव्यवस्था फैल गई। देवी के उग्र रूप ने उनके अहंकार और बल के प्रदर्शन को निष्फल कर दिया।
6. देवी चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध हुईं
चण्ड और मुण्ड का वध करने के बाद काली ने दोनों असुरों के मस्तक लेकर देवी अम्बिका के सामने उपस्थित होकर कहा कि उन्होंने चण्ड और मुण्ड को मार दिया है। अब शुम्भ और निशुम्भ का अंत भी देवी स्वयं करेंगी।
देवी अम्बिका प्रसन्न हुईं और उन्होंने काली से कहा कि चण्ड और मुण्ड का वध करने के कारण वे संसार में चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होंगी।
इस प्रकार चण्ड और मुण्ड के नामों से मिलकर चामुण्डा नाम की प्रसिद्धि का वर्णन दुर्गा सप्तशती में मिलता है।
यह प्रसंग देवी के विभिन्न रूपों की एकता को भी सामने लाता है। अम्बिका और काली अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन कथा में काली अम्बिका की शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं।
7. शुम्भ-निशुम्भ के विरुद्ध संघर्ष आगे बढ़ा
चण्ड और मुण्ड के मारे जाने से शुम्भ और निशुम्भ की शक्ति को एक और बड़ा आघात पहुँचा। उनके प्रमुख सेनापति मारे जा चुके थे, फिर भी असुरों का अहंकार समाप्त नहीं हुआ था।
अब शुम्भ और निशुम्भ को देवी की शक्ति का सामना करना था। आगे की कथा में रक्तबीज नामक असुर का प्रसंग आता है, जिसकी विशेष शक्ति के कारण युद्ध और भी कठिन हो जाता है।
इस प्रकार सातवाँ अध्याय चण्ड-मुण्ड के वध और चामुण्डा नाम की उत्पत्ति के साथ समाप्त होता है।
व्याख्या : चण्ड-मुण्ड वध का आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन
1. चण्ड और मुण्ड किस प्रवृत्ति के प्रतीक हो सकते हैं?
चण्ड और मुण्ड दुर्गा सप्तशती में शुम्भ के सेनापति हैं। प्रतीकात्मक चिंतन में उनके नामों को उग्रता, कठोरता और विवेकहीन आक्रामकता जैसी प्रवृत्तियों से जोड़कर देखा जा सकता है।
जब मनुष्य का क्रोध नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब वह दूसरों के विचारों और अधिकारों का सम्मान करना छोड़ सकता है। इसी तरह जब व्यक्ति केवल अपनी इच्छा पूरी करने पर अड़ा रहता है, तो वह उचित-अनुचित का विचार खो सकता है।
यह प्रतीकात्मक व्याख्या है, मूल ग्रंथ में इन पात्रों को असुर सेनापतियों के रूप में वर्णित किया गया है।
2. काली का उग्र स्वरूप क्या बताता है?
काली का स्वरूप देवी की उस शक्ति को सामने लाता है जो अत्याचार और हिंसक आक्रमण के सामने निर्णायक रूप से सक्रिय होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझा जा सकता है कि करुणा और शांति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अन्याय का सामना करने के लिए दृढ़ता भी आवश्यक है।
काली का उग्र रूप यह याद दिलाता है कि जब किसी समस्या को केवल समझाने से दूर नहीं किया जा सकता, तब उचित और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता हो सकती है।
3. चामुण्डा नाम का महत्व
चामुण्डा नाम की उत्पत्ति चण्ड और मुण्ड के वध से जुड़ी हुई है। यह प्रसंग देवी के एक विशिष्ट स्वरूप और उनके पराक्रम की पहचान बन जाता है।
धार्मिक परंपरा में देवी के अनेक नाम और रूप उनकी विभिन्न शक्तियों तथा कार्यों को व्यक्त करते हैं। इससे यह विचार सामने आता है कि एक ही परम शक्ति को अलग-अलग परिस्थितियों में विभिन्न रूपों में अनुभव किया जा सकता है।
4. अहंकार और आक्रामकता का परिणाम
चण्ड और मुण्ड देवी को अपने स्वामी की इच्छा के अनुसार नियंत्रित करना चाहते हैं। वे देवी की स्वतंत्रता और शक्ति को समझे बिना आक्रमण करते हैं और अंततः स्वयं मारे जाते हैं।
इस प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप से समझें तो अहंकार से प्रेरित आक्रामकता व्यक्ति की निर्णय क्षमता को कमजोर कर सकती है। जब कोई व्यक्ति दूसरों को केवल अपने उद्देश्य की पूर्ति का साधन समझता है, तो संघर्ष बढ़ने की आशंका होती है।
5. इस अध्याय से जीवन के लिए सीख
क्रोध को विवेक के अधीन रखें: आवेग में लिया गया निर्णय विनाशकारी हो सकता है।
दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करें: किसी को अपनी इच्छा के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है।
अन्याय के विरुद्ध दृढ़ रहें: परिस्थितियों के अनुसार साहस और निर्णायक कार्रवाई आवश्यक हो सकती है।
शक्ति का उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग करें: सामर्थ्य का उद्देश्य केवल प्रभुत्व स्थापित करना नहीं होना चाहिए।
अपने भीतर की आक्रामक प्रवृत्तियों को पहचानें: आत्मचिंतन व्यक्ति को बेहतर निर्णय लेने में सहायता कर सकता है।
दुर्गा सप्तशती का सातवाँ अध्याय चण्ड-मुण्ड के वध और देवी काली के चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होने की कथा प्रस्तुत करता है। इसमें देवी का उग्र स्वरूप अन्याय और असुरों के आक्रमण का अंत करता है।
इस अध्याय का केंद्रीय संदेश है कि शक्ति का एक रूप करुणा और संरक्षण है, तो दूसरा रूप अन्याय के विरुद्ध निर्णायक प्रतिरोध भी है। जीवन में इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
चण्ड-मुण्ड वध हमें याद दिलाता है कि अहंकार और विवेकहीन आक्रामकता के सामने साहस, सजगता और दृढ़ता का महत्व है।